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Soh

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अपडेट: इस लेख की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग अब SoundCloud पर उपलब्ध है! https://soundcloud.com/soh-wei-yu/sets/awakening-to-reality-blog

टिप्पणी: निम्नलिखित अधिकांश सामग्री Thusness (जिन्हें PasserBy या John Tan के नाम से भी जाना जाता है) की विभिन्न रचनाओं का न्यूनतम संपादित संकलन है। जहाँ Soh को स्पष्ट रूप से श्रेय न दिया गया हो, वहाँ नीचे का समस्त पाठ Thusness/John Tan का माना जाए।

जैसे नदी बहकर समुद्र में मिल जाती है, वैसे ही स्व शून्य में विलीन हो जाता है। जब साधक व्यक्तित्व की मायिक प्रकृति को पूरी तरह स्पष्ट रूप से जान लेता है, तब विषय-वस्तु का विभाजन नहीं होता। “हूँ-भाव” (AMness) का अनुभव करने वाला व्यक्ति “हर चीज़ में हूँ-भाव” पाएगा। यह कैसा होता है?

व्यक्तित्व-भाव से मुक्त होने पर — आना-जाना, जीवन-मरण — सभी घटनाएँ मानो इस हूँ-भाव की पृष्ठभूमि से उठती और उसमें लीन होती दिखाई देती हैं। यह हूँ-भाव किसी ‘सत्ता’ की तरह कहीं स्थित नहीं अनुभव होता, न भीतर, न बाहर; बल्कि यह सभी घटनाओं के घटित होने की आधार-यथार्थता (ground reality) के रूप में अनुभव होता है। यहाँ तक कि लय (मृत्यु) के क्षण में भी योगी उस यथार्थ में पूरी तरह प्रत्ययित रहता है; ‘वास्तविक’ को जितनी स्पष्टता से संभव है, उतनी स्पष्टता से अनुभव करता हुआ। हम उस हूँ-भाव को खो नहीं सकते; बल्कि सभी चीज़ें केवल उसी में विलीन होकर फिर उसी से प्रकट हो सकती हैं। यह हूँ-भाव हिला नहीं है; न कोई आना है, न जाना। यही “हूँ-भाव” ईश्वर (God) है।

साधकों को इसे कभी भी सच्चे बुद्ध-मन (Buddha Mind) के रूप में नहीं समझना चाहिए!

“मैं हूँ”-भाव (I AMness) ही निर्मल जागरूकता (Pristine Awareness) है। इसी कारण वह इतना अभिभूत कर देने वाला लगता है। बस उसकी शून्यता-प्रकृति के प्रति कोई ‘अंतर्दृष्टि’ नहीं होती।

कुछ भी टिकता नहीं और थामे रखने योग्य कुछ भी नहीं। जो वास्तविक है, वह निर्मल है और प्रवाहित है; जो टिकता हुआ लगता है, वह भ्रम है। किसी पृष्ठभूमि या स्रोत (Source) में वापस धँसने की प्रवृत्ति ‘स्व’ (Self) की प्रबल कर्मजन्य वासनाओं से अंधे हो जाने के कारण है। यह ‘बंधन’ की एक परत है जो हमें कुछ ‘देखने’ से रोकती है… यह बहुत सूक्ष्म, बहुत पतली, बहुत महीन है… लगभग पकड़ में ही नहीं आती। यह ‘बंधन’ हमें यह देखने से रोकता है कि “साक्षी” (Witness) वास्तव में क्या है और हमें लगातार साक्षी (Witness), स्रोत (Source) और केंद्र (Center) में लौटते रहने को विवश करता है। हर क्षण हम साक्षी (Witness) में, केंद्र (Center) में, इस होने-भाव (Beingness) में वापस धँसना चाहते हैं—यह एक भ्रम है। यह आदतन है और लगभग सम्मोहन-जैसा है।

लेकिन हम जिस “साक्षी” (Witness) की बात कर रहे हैं, वह आखिर है क्या? वह स्वयं अभिव्यक्ति ही है! वह स्वयं प्रकटता ही है! लौटने के लिए कोई स्रोत (Source) नहीं; प्रकटता ही स्रोत (Source) है! इसमें विचारों का क्षण-प्रतिक्षण भी शामिल है। समस्या यह है कि हम चुनते हैं, जबकि वास्तव में सब वही है। चुनने के लिए कुछ भी नहीं।

कोई दर्पण प्रतिबिंबित नहीं कर रहा
सदा से केवल अभिव्यक्ति ही है।
एक हाथ ताली बजाता है
सब कुछ बस है!

“मैं हूँ”-भाव (I AMness) और “कोई-दर्पण-प्रतिबिंबन नहीं” (no “Mirror Reflecting”) के बीच एक और विशिष्ट चरण है, जिसे मैं “दर्पणवत उज्ज्वल स्पष्टता” (Mirror Bright Clarity) कहूँगा। शाश्वत साक्षी (Eternal Witness) को एक निराकार, स्फटिक-स्वच्छ दर्पण के रूप में अनुभव किया जाता है, जो सभी घटनाओं के अस्तित्व को प्रतिबिंबित करता है। यह स्पष्ट ज्ञान होता है कि ‘स्व’ मौजूद नहीं है, फिर भी ‘स्व’ की कर्मजन्य प्रवृत्ति का अंतिम अंश अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ होता। वह अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर बना रहता है। “कोई-दर्पण-प्रतिबिंबन” (no mirror reflecting) की अवस्था में ‘स्व’ की कर्मजन्य प्रवृत्ति बहुत हद तक ढीली पड़ जाती है और साक्षी का वास्तविक स्वरूप देखा जाता है। सदा से कोई साक्षी किसी चीज़ को देख नहीं रहा; केवल अभिव्यक्ति ही है। केवल एक है। दूसरा हाथ है ही नहीं…

कहीं कोई अदृश्य साक्षी छिपा नहीं बैठा। जब भी हम किसी अदृश्य, पारदर्शी छवि में लौटने की कोशिश करते हैं, वह फिर से विचार का खेल ही होता है। वही ‘बंधन’ काम कर रहा होता है। (देखें “Thusness/PasserBy के ज्ञानोदय के सात चरण” (“Thusness/PasserBy’s Seven Stages of Enlightenment”))

अतीन्द्रिय झलकें हमारे मन की संज्ञानात्मक क्षमता द्वारा भ्रमित हो जाती हैं। वह संज्ञान-प्रणाली द्वैतमय है। सब कुछ मन (Mind) है, पर इस मन को ‘स्व’ (Self) नहीं मानना चाहिए। “मैं हूँ” (I AM), शाश्वत साक्षी (Eternal Witness)—ये सब हमारी संज्ञान-प्रक्रिया के उत्पाद हैं और सच्चे दर्शन को रोकने वाले मूल कारण हैं।

जब चेतना “मैं हूँ” (I AM) की शुद्ध अनुभूति का अनुभव करती है और होने की अनुभूति के उस अतीन्द्रिय, निर्विचार क्षण से अभिभूत हो जाती है, तब वह उस अनुभव को अपनी सबसे शुद्ध पहचान के रूप में पकड़ लेती है। ऐसा करके वह सूक्ष्म रूप से एक ‘देखने वाले’ को गढ़ देती है और यह नहीं देख पाती कि ‘अस्तित्व की शुद्ध अनुभूति’ (Pure Sense of Existence) वास्तव में केवल शुद्ध चेतना का एक पक्ष है, जो मनो-क्षेत्र से संबंधित है। यही आगे चलकर ऐसी कर्मजन्य दशा बन जाता है जो अन्य इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न होने वाली शुद्ध चेतना के अनुभव को रोकती है। इसे अन्य इन्द्रियों तक बढ़ाकर देखें: सुनना बिना सुनने वाले के है और देखना बिना देखने वाले के है — शुद्ध ध्वनि-चेतना (Pure Sound-Consciousness) का अनुभव शुद्ध दृश्य-चेतना (Pure Sight-Consciousness) से सर्वथा भिन्न है। सचमुच, यदि हम ‘मैं’ को छोड़कर उसकी जगह “शून्यता-स्वभाव” (Emptiness Nature) रख सकें, तो चेतना को अ-स्थानिक रूप में अनुभव किया जाता है। कोई भी अवस्था दूसरी से अधिक शुद्ध नहीं है। सब कुछ बस ‘एक रस’ (एक-स्वाद) है — उपस्थिति (Presence) की बहुरूपता।

‘कौन’, ‘कहाँ’ और ‘कब’, ‘मैं’, ‘यहाँ’ और ‘अब’ — इन सबको अंततः पूर्ण पारदर्शिता के अनुभव के लिए जगह छोड़नी होगी। किसी स्रोत में पीछे मत लौटो; केवल अभिव्यक्ति ही पर्याप्त है। यह इतना स्पष्ट हो जाएगा कि पूर्ण पारदर्शिता का अनुभव होगा। जब पूर्ण पारदर्शिता स्थिर हो जाती है, तब अतीन्द्रिय देह का अनुभव होता है और धर्मकाय हर जगह दिखाई देता है। यही बोधिसत्त्व का समाधि-आनंद है। यही साधना का फल है।

सभी प्रकटनों का अनुभव पूर्ण जीवंतता, सजीवता और स्पष्टता के साथ करो। वे वास्तव में हमारी ही निर्मल जागरूकता (Pristine Awareness) हैं, हर क्षण और हर जगह, अपनी समस्त बहुरूपताओं और विविधताओं में। जब कारण-प्रत्यय होते हैं, तब अभिव्यक्ति होती है; जब अभिव्यक्ति होती है, तब जागरूकता होती है। सब एक ही यथार्थ है।

देखो! बादल का बनना, वर्षा, आकाश का रंग, गर्जन — यह जो समूची घटना घट रही है, यह क्या है? यही निर्मल जागरूकता (Pristine Awareness) है। किसी भी चीज़ से तादात्म्य किए बिना, शरीर में सीमित हुए बिना, परिभाषा से मुक्त होकर, इसे जैसा है वैसा अनुभव करो। यह हमारी निर्मल जागरूकता (Pristine Awareness) का पूरा क्षेत्र है, जो अपने शून्यता-स्वभाव में घटित हो रहा है।

यदि हम ‘स्व’ में लौट पड़ते हैं, तो हम भीतर बंद हो जाते हैं। पहले हमें प्रतीकों के पार जाना होगा और उस सार को देखना होगा जो प्रकट हो रहा है। इस कला में पारंगत हो जाओ, जब तक बोधि का कारक उदित होकर स्थिर न हो जाए, ‘स्व’ शांत न पड़ जाए, और केंद्र-विहीन आधार-यथार्थता (ground reality without core) समझ में न आ जाए।

बहुत बार यह समझ लिया जाता है कि होने की अनुभूति “I AM” के अनुभव में है; “I AM” शब्दों और लेबल के बिना भी, ‘अस्तित्व की शुद्ध अनुभूति’—उपस्थिति अब भी बस है। यह होने की अनुभूति में विश्राम करने की एक अवस्था है। लेकिन बौद्ध धर्म में यह भी संभव है कि हर चीज़ को, हर क्षण, अप्रकट के रूप में अनुभव किया जाए।

कुंजी ‘तुम’ में भी निहित है, लेकिन बात यह ‘देखने’ की है कि वास्तव में कोई ‘तुम’ है ही नहीं। यह देखने की बात है कि घटनाओं के उदय के बीच कभी कोई कर्ता खड़ा नहीं होता। शून्यता-स्वभाव के कारण बस घटना-मात्र घट रही है; कभी कोई ‘मैं’ कुछ कर नहीं रहा। जब ‘मैं’ शांत पड़ता है, तो प्रतीक, लेबल और समस्त वैचारिक जगत की परत भी साथ चली जाती है। तब कर्ता के बिना जो बचता है, वह केवल घटना-मात्र है।

और देखना, सुनना, महसूस करना, चखना, सूँघना — और केवल इतना ही नहीं — सब कुछ पूरी तरह स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट होता है। बहुरूप उपस्थिति (Presence) की एक संपूर्णता। अद्वैत की अंतर्दृष्टि के बाद एक स्तर तक पहुँचने पर एक बाधा आती है। किसी न किसी तरह साधक अद्वैत की स्वस्फूर्तता को सचमुच “भेद” नहीं पाता। ऐसा इसलिए है कि भीतर छिपा गहरा ‘दृष्टिकोण’ अद्वैत अनुभव के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता। इसलिए शून्यता की ‘दृष्टिरहित दृष्टि’ (Viewless View) का बोध आवश्यक है। (शून्यता पर आगे और) वर्षों में मैंने “स्वाभाविकता” (naturalness) शब्द को परिष्कृत करके “प्रत्ययों के कारण स्वस्फूर्त उदय” (spontaneously arise due to conditions) कहा है। जब प्रत्यय हैं, उपस्थिति (Presence) है। यह देश-काल की निरंतरता के भीतर बँधा नहीं है। यह केंद्रता को घोलने में सहायक होता है।

इस बिंदु पर John Tan का संबंधित मीडिया-संकलन: John Tan के YouTube वीडियो और ऑडियो: प्रतीत्यसमुत्पाद और शून्यता की एकता (YouTube Videos and Audios by John Tan: Union of Dependent Arising and Emptiness).

यदि जो कुछ है वह केवल प्रकटता ही है, और प्रकटता ही वास्तव में स्रोत है, तो प्रकटताओं की विविधता किससे उठती है? चीनी की “मिठास” आकाश के “नीलेपन” जैसी नहीं है। यही बात “हूँ-भाव” (AMness) पर भी लागू होती है… सब समान रूप से शुद्ध हैं; कोई अवस्था दूसरी से अधिक शुद्ध नहीं, केवल प्रत्यय भिन्न हैं। प्रत्यय वे कारक हैं जो प्रकटनों को उनके ‘रूप’ देते हैं। बौद्ध धर्म में निर्मल जागरूकता और प्रत्यय अविभाज्य हैं।

“कोई-दर्पण-प्रतिबिंबन नहीं” (no mirror reflecting) के बाद वह ‘बंधन’ बहुत हद तक ढीला पड़ जाता है। पलक झपकना, हाथ उठाना... उछाल... फूल, आकाश, चहचहाते पक्षी, पदचाप... हर एक क्षण... ऐसा कुछ भी नहीं जो वही न हो! बस वही है। यह तात्कालिक क्षण ही पूर्ण बुद्धिमत्ता, पूर्ण जीवन, पूर्ण स्पष्टता है। सब कुछ जानता है; वही है। दो नहीं हैं, एक ही है। Smile

‘साक्षी’ से ‘निःसाक्षी’ की ओर संक्रमण की प्रक्रिया में कुछ लोग प्रकटता को ही बुद्धिमत्ता के रूप में अनुभव करते हैं, कुछ उसे अपार जीवंतता के रूप में, कुछ उसे प्रचंड स्पष्टता के रूप में, और कुछ के लिए ये तीनों गुण एक ही क्षण में फटकर एक हो जाते हैं। फिर भी तब तक यह ‘बंधन’ पूरी तरह समाप्त होने से बहुत दूर होता है; हम जानते हैं कि यह कितना सूक्ष्म हो सकता है ;) । यदि भविष्य में तुम्हें कठिनाई आए, तो प्रत्ययता, अर्थात् सशर्तता, का सिद्धांत सहायक हो सकता है (मैं जानता हूँ कि अद्वैत के अनुभव के बाद व्यक्ति कैसा महसूस करता है; उन्हें ‘धर्म’ पसंद नहीं आता... :) बस चार सरल वाक्य)।

जब यह है, तब वह है।
इसके उदय होने पर, वह उदित होता है।
जब यह नहीं है, तब वह भी नहीं है।
इसके निरोध होने पर, वह भी निरुद्ध हो जाता है।

यह वैज्ञानिकों के लिए नहीं कहा जा रहा; यह हमारी समग्र निर्मल जागरूकता (Pristine Awareness) की पूर्णता के अनुभव के लिए कहीं अधिक निर्णायक है।
‘कौन’ चला गया है; ‘कहाँ’ और ‘कब’ नहीं (Soh: अनात्मा की अंतर्दृष्टि के प्रारम्भिक भेदन के बाद).

आनंद लो — यह है, वह है। :)

यद्यपि अद्वैत वेदान्त में अद्वैत है, और बौद्ध धर्म में अनात्मा है, फिर भी अद्वैत वेदान्त एक “परम पृष्ठभूमि” में विश्राम करता है (जिससे वह द्वैतमय बन जाता है) (2022 में Soh की टिप्पणी: अद्वैत वेदान्त के कुछ दुर्लभ रूपों, जैसे Greg Goode या Atmananda की प्रत्यक्ष-पथ (Direct Path) परंपरा में, अंततः [सूक्ष्म विषय-वस्तु] साक्षी भी ढह जाता है और अंत में चेतना की धारणा भी विलीन हो जाती है -- देखें https://www.amazon.com/After-Awareness-Path-Greg-Goode/dp/1626258090), जबकि बौद्ध धर्म पृष्ठभूमि को पूरी तरह समाप्त कर देता है और घटनाओं के शून्यता-स्वभाव में विश्राम करता है; उदय और लय में ही निर्मल जागरूकता है। बौद्ध धर्म में कोई शाश्वतता नहीं है, केवल अकालिक निरंतरता है (अकालिक इस अर्थ में कि वर्तमान क्षण की सजीव प्रत्यक्षता है, पर परिवर्तन भी है और तरंग-पटर्न की तरह निरंतरता भी)। कोई बदलने वाली वस्तु नहीं है, केवल परिवर्तन है।
विचार, भावनाएँ और धारणाएँ आते-जाते हैं; वे ‘मैं’ नहीं हैं; उनका स्वभाव अनित्य है। क्या यह स्पष्ट नहीं कि यदि मैं इन आते-जाते विचारों, भावनाओं और धारणाओं से अवगत हूँ, तो इससे यह सिद्ध होता है कि कोई सत्ता अपरिवर्तनीय और अचल है? यह अनुभवसिद्ध सत्य नहीं, बल्कि एक तार्किक निष्कर्ष है। निराकार यथार्थ वासनाओं और पूर्व अनुभव को स्मरण कर लेने की शक्ति के कारण वास्तविक और अपरिवर्तनीय प्रतीत होता है। (देखें कर्मिक प्रवृत्तियों का मायाजाल (The Spell of Karmic Propensities)) एक और अनुभव भी है; यह अनुभव अनित्य प्रवाहों — रूपों, विचारों, भावनाओं और धारणाओं — को न तो त्यागता है, न उनसे असंबद्ध होता है। यह वह अनुभव है जिसमें विचार स्वयं सोचता है और ध्वनि स्वयं सुनती है। विचार जानता है, इसलिए नहीं कि कोई अलग ज्ञाता है, बल्कि इसलिए कि वही ज्ञेय है। वह जानता है क्योंकि वही है। इससे यह अंतर्दृष्टि जन्म लेती है कि है-भाव (Isness) कभी भी अविभाजित अवस्था में मौजूद नहीं होता, बल्कि क्षणभंगुर अभिव्यक्ति के रूप में होता है; अभिव्यक्ति का प्रत्येक क्षण अपने-आप में पूर्ण, एक सर्वथा नई यथार्थता है।

मन को वर्गीकृत करना अच्छा लगता है और वह शीघ्र पहचान बाँध देता है। जब हम सोचते हैं कि जागरूकता स्थायी है, तो हम उसके अनित्य पक्ष को ‘देख’ नहीं पाते। जब हम उसे निराकार के रूप में देखते हैं, तो रूपों के रूप में जागरूकता के ताने-बाने और बनावट की सजीवता चूक जाते हैं। जब हम सागर से आसक्त होते हैं, तो हम तरंग-रहित सागर खोजते हैं, यह जाने बिना कि सागर और तरंग दोनों एक ही हैं। प्रकटताएँ दर्पण पर जमी धूल नहीं हैं; धूल ही दर्पण है। आरम्भ से कभी कोई धूल थी ही नहीं; यह धूल तब बनती है जब हम किसी एक कण से तादात्म्य कर लेते हैं और बाकी सब धूल बन जाता है। अप्रकट ही प्रकटता है,
समस्त का न-वस्तु-भाव,
पूर्णतः निश्चल, फिर भी सदा प्रवहमान,
यही स्रोत का स्वस्फूर्त उदय-स्वभाव है।
बस स्वतः-ऐसा।
अवधारणात्मकता से पार जाने के लिए स्वतः-ऐसा का सहारा लो।
प्रपंच-जगत की अविश्वसनीय यथार्थता में पूरी तरह स्थित हो जाओ।


-------------- अद्यतन: 2022

सोह किसी ऐसे व्यक्ति से जो ‘मैं हूँ’ चरण में है: मेरे AtR (Awakening to Reality समुदाय — वास्तविकता के प्रति जागरण समुदाय) में लगभग 60 लोगों ने अनात्मा (Anatta) का बोध किया है, और अधिकांश लोग उन्हीं चरणों से गुज़रे हैं (I AM से अद्वैत तक, अद्वैत से अनात्म तक… और बहुत से अब द्विविध शून्यता (twofold emptiness) में भी प्रवेश कर चुके हैं), और यदि आप चाहें तो हमारे ऑनलाइन समुदाय में शामिल होने के लिए आपका बहुत स्वागत है: https://www.facebook.com/groups/AwakeningToReality (अद्यतन: फ़ेसबुक समूह अब बंद है)

व्यावहारिक दृष्टि से, यदि आपको ‘मैं हूँ’ का जागरण हुआ है और आप इन लेखों के आधार पर चिंतन और अभ्यास पर ध्यान केंद्रित करें, तो एक वर्ष के भीतर अनात्म की अंतर्दृष्टि जाग सकती है। बहुत से लोग दशकों, यहाँ तक कि जन्मों तक I AM पर अटके रह जाते हैं, लेकिन मैं John Tan के मार्गदर्शन और निम्नलिखित चिंतनों पर ध्यान केंद्रित करने के कारण एक वर्ष के भीतर I AM से अनात्म-बोध तक बढ़ सका: 1) I AM के चार पहलू (The Four Aspects of I AM), https://www.awakeningtoreality.com/2018/12/four-aspects-of-i-am.html 2) दो अद्वैत चिंतन (The Two Nondual Contemplations), https://www.awakeningtoreality.com/2018/12/two-types-of-nondual-contemplation.html 3) अनात्मा (Anatta) के दो श्लोक (The Two Stanzas of Anatta), https://www.awakeningtoreality.com/2009/03/on-anatta-emptiness-and-spontaneous.html 4) बाहिय सुत्त (Bahiya Sutta), https://www.awakeningtoreality.com/2008/01/ajahn-amaro-on-non-duality-and.html और https://www.awakeningtoreality.com/2010/10/my-commentary-on-bahiya-sutta.html
जागरूकता की बनावटों और रूपों में उतरना महत्वपूर्ण है, केवल निराकार पर टिके न रहो… फिर अनात्मा (Anatta) के दो श्लोकों पर चिंतन के साथ तुम अद्वैत-अनात्म में प्रवेश करोगे।
यहाँ एक और अच्छे लेख से एक अंश है:
“‘है-भाव’ (Isness) क्या है, इसे व्यक्त करना अत्यंत कठिन है। है-भाव (Isness) रूपों के रूप में प्रकट जागरूकता है। यह उपस्थिति की एक शुद्ध अनुभूति है, पर साथ ही रूपों की ‘पारदर्शी ठोसता’ को भी समेटे हुए है। यह जागरूकता की एक क्रिस्टल-सी स्पष्ट संवेदना है जो प्रपंचमय अस्तित्व की बहुरूपता के रूप में प्रकट होती है। यदि है-भाव (Isness) की इस ‘पारदर्शी ठोसता’ के अनुभव में हम अस्पष्ट हैं, तो उसका कारण हमेशा वही ‘स्व’-बोध है जो विभाजन की भावना पैदा करता है… तुम्हें जागरूकता के ‘रूप’ पक्ष पर ज़ोर देना होगा। वही ‘रूप’ हैं, वही ‘वस्तुएँ’ हैं।” - John Tan, 2007
ये लेख भी सहायक हो सकते हैं:
Thusness की प्रारम्भिक फोरम पोस्टें (Early Forum Posts by Thusness) - https://www.awakeningtoreality.com/2013/09/early-forum-posts-by-thusness_17.html (जैसा कि स्वयं Thusness ने कहा, ये प्रारम्भिक फोरम पोस्टें I AM से अद्वैत और अनात्म तक किसी का मार्गदर्शन करने के लिए उपयुक्त हैं),
AtR मार्गदर्शिका का एक नया संक्षिप्त (काफ़ी छोटा और अधिक संक्षिप्त) संस्करण अब यहाँ उपलब्ध है: https://www.awakeningtoreality.com/2022/06/the-awakening-to-reality-practice-guide.html, यह नवागन्तुकों के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है, क्योंकि मूल संस्करण (1000+ पृष्ठ) कुछ लोगों के लिए बहुत लम्बा हो सकता है।
मैं उस निःशुल्क AtR अभ्यास-मार्गदर्शिका को पढ़ने की अत्यन्त अनुशंसा करता हूँ। जैसा कि Yin Ling ने कहा: “मुझे लगता है कि AtR मार्गदर्शिका का संक्षिप्त संस्करण बहुत अच्छा है। यदि लोग सचमुच जाकर उसे पढ़ें, तो वह उन्हें अनात्म तक ले जा सकता है। संक्षिप्त और सीधा।”
अद्यतन: 9 सितंबर 2023 - Awakening to Reality अभ्यास-मार्गदर्शिका का ऑडियोबुक (निःशुल्क) अब SoundCloud पर उपलब्ध है! https://soundcloud.com/soh-wei-yu/sets/the-awakening-to-reality

John Tan के नए YouTube वीडियो और ऑडियो (2026)

“मैं कौन हूँ” बनाम अनात्मा (Anatta):

ऑडियो शिक्षाएँ:

मौन साक्षी एक जाल है:
https://files.awakeningtoreality.com/The_Silent_Witness_Is_a_Trap.mp3



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अद्यतन:

एक पाठक का प्रश्न (पुनर्कथित)

एक पाठक आत्म-विचार के दौरान बार-बार होने वाले एक अनुभव को साझा करते हुए लिखता है। उन्हें एक रिट्रीट याद है जहाँ एक शिक्षक ने पुष्टि की थी कि “मैं हूँ” की अनुभूति को भीतर एक “सूक्ष्म संवेदना” के रूप में खोजा जा सकता है। पाठक इस निर्देश से बहुत लम्बे समय से जूझ रहे हैं; जैसे-जैसे वे इसकी जाँच करते हैं, अनुभव “एक संवेदना और कुछ ऐसा जो वास्तव में कोई चीज़ नहीं है” तक गहराता जाता है, लेकिन जैसे ही उन्हें लगता है कि वे उसके आर-पार जाने वाले हैं, अक्सर एक तीखा भय उठता है और वे प्रतिक्रियावश ध्यान भटका कर पीछे हट जाते हैं।

स्पष्टता पाने के लिए, पाठक ने “मैं कौन हूँ?” पूछने पर उठने वाली इस “सूक्ष्म संवेदना” के बारे में एक AI चैटबॉट (Grok) से सलाह ली। AI ने इसे “जाननेपन” (knowingness), “अनावृत जागरूकता” (bare awareness), या “मन की दीप्ति” (mind’s luminosity) बताया — और बौद्ध शब्दों जैसे rigpa या citta-pabhā का उल्लेख किया — लेकिन साथ ही इसे अद्वैत-प्रत्यभिज्ञा से पहले अविद्या की अंतिम सूक्ष्म वस्तु या “आवरण” भी कहा। पाठक को यह व्याख्या अपने भय को समझने में सहायक लगी, और वे मान बैठे कि यही संवेदना अंतिम अवरोध है। पाठक मुझसे इस “सूक्ष्म संवेदना” और AI की उस व्याख्या पर मेरी राय पूछते हैं जिसमें इसे मन की ज्योतिर्मयता के एक वस्तुरूप प्रकट होने के रूप में देखा गया है।


सोह का उत्तर:

मैं AI का उत्साही हूँ, लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके प्रश्न के मामले में LLMs भ्रामक हैं। मैंने यही प्रश्न ChatGPT और Gemini से भी पूछा था, और दोनों ने अत्यन्त निराशाजनक उत्तर दिए। इसलिए केवल Grok ही निराशाजनक नहीं है, हालाँकि मुझे लगता है कि Grok का उत्तर उन दोनों से भी बदतर प्रतीत होता है।

जिस स्व-बोध को आप शुरुआत में पहचानते हैं (वह “पहला प्रभाव कि यह एक बहुत सूक्ष्म संवेदना है”), वह “मैं हूँ” (I AM), साक्षी (Witness), या प्रकाशमान-मन (Luminous Mind) की प्राप्ति नहीं है। लगभग हमेशा वह एक अपेक्षाकृत स्थूल स्व-बोध होता है — या जिसे रामण महर्षि “मैं-विचार” (I-thought) कहते हैं। जब आप उसकी जाँच करते हैं, तो वह प्रायः सिर, या छाती, आदि कहीं उभरता हुआ-सा प्रतीत होता है — एक सूक्ष्म संदर्भ-बिन्दु, जिसे आप अपने शरीर के भीतर कहीं अपने-आप के रूप में पहचानते हैं (और आगे गहराई से देखने तक शुरू में आपको यह भी स्पष्ट नहीं हो सकता कि वह ठीक “कहाँ” है)।

वह आपकी वास्तविक सत्ता नहीं है, और न ही वह वह आत्मा या स्व है जो आत्म-विचार द्वारा साक्षात् किया जाता है। इसलिए आपको जिज्ञासा को और आगे ले जाना होगा, क्योंकि कहीं स्थित वह स्व-अनुभूति अभी भी जागरूकता की एक वस्तु है — वह आती-जाती है — और वह आप नहीं हैं। इसीलिए आत्म-विचार में उसका निषेध “नेति नेति” — “यह नहीं, वह नहीं” — के रूप में किया जाता है। तब प्रश्न उठता है: आप कौन हैं? उस सबको जानने वाला कौन या क्या है?

डॉ. ग्रेग गूड का यह वीडियो अवश्य देखें; इससे बात स्पष्ट होगी: https://www.youtube.com/watch?v=ZYjI6gh9RxE

और आत्म-विचार पर मेरा यह लेख भी बात को स्पष्ट करने में सहायक होगा: https://www.awakeningtoreality.com/2024/05/self-enquiry-neti-neti-and-process-of.html

आपको धैर्य रखना होगा। मुझे आत्म-साक्षात्कार तक पहुँचने में दो वर्ष की आत्म-विचार साधना लगी थी, और उससे पहले अनेक झलकियाँ भी मिली थीं।

1. “मैं हूँ” (I AM) की वास्तविक प्राप्ति

“मैं हूँ” (I AM) की वास्तविक प्राप्ति उस धुँधली अनुभूति की ओर संकेत नहीं करती जिसमें कोई व्यक्तिक सत्ता शरीर के भीतर कहीं स्थित प्रतीत हो; बल्कि यह सर्वव्यापी उपस्थिति (all-pervasive Presence) की एक अद्वैत प्राप्ति को सूचित करती है। लेकिन “मैं हूँ” (I AM) की यह प्राप्ति (Thusness के चरण 1 और 2: https://www.awakeningtoreality.com/2007/03/thusnesss-six-stages-of-experience.html) अद्वैत या अनात्मा की प्राप्ति नहीं समझी जानी चाहिए; वे Thusness के चरण 4 और 5 हैं।

सिम पर्न चोंग, जिन्होंने इसी प्रकार की अंतर्दृष्टियों से गुज़रा, ने 2022 में लिखा:

“यह केवल मेरी राय है... मेरे मामले में, जब मैंने पहली बार निर्णायक रूप से ‘मैं हूँ’ उपस्थिति का अनुभव किया, तब बिल्कुल कोई विचार नहीं था। बस एक सीमा-रहित, सर्व-व्यापक उपस्थिति थी। वास्तव में यह सोच भी नहीं थी कि यह ‘मैं हूँ’ है या नहीं। कोई वैचारिक गतिविधि नहीं थी। उस अनुभव के बाद ही उसकी व्याख्या ‘मैं हूँ’ के रूप में की गई। मेरे लिए ‘मैं हूँ’ का अनुभव वास्तव में इस बात की एक झलक है कि वास्तविकता कैसी है... लेकिन बहुत जल्दी उसकी पुनर्व्याख्या कर दी जाती है। ‘सीमारहितता’ का गुण अनुभव होता है, लेकिन ‘विषय-वस्तु का अभाव’, ‘पारदर्शी दीप्ति’, ‘शून्यता’ जैसे अन्य गुण तब तक समझ में नहीं आते। मेरा निष्कर्ष यह है कि जब ‘मैं हूँ’ अनुभवित होता है, तब आपको किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रहती कि वही वह अनुभव है।”

जॉन टैन ने भी कहा:

“John Tan: हम उसे उपस्थिति कहते हैं, या कहें, उम्, हम उसे उपस्थिति कहते हैं। (वक्ता: क्या वही I AM है?) I AM वास्तव में अलग है। वह भी उपस्थिति है। वह भी उपस्थिति है। I AM, यह निर्भर करता है... देखो, I AM की परिभाषा भी एक-सी नहीं होती। तो, उम्। कुछ लोगों के लिए यह सचमुच वही नहीं होता, जैसे Geovani? उसने मुझे लिखा था कि उसका I AM सिर में स्थानीयकृत-सा है। तो यह बहुत व्यक्तिगत है। लेकिन हम जिस I AM की बात कर रहे हैं, वह वह नहीं है। जिस I AM की हम बात कर रहे हैं, वह वास्तव में — जैसे, उदाहरण के लिए, मुझे लगता है, उम् — Long Chen (Sim Pern Chong) उससे गुज़रे हैं। वह वास्तव में सर्व-समावेशी है। वास्तव में वही है जिसे हम अद्वैत अनुभव कहते हैं। यह बहुत, उम्... उसमें कोई विचार नहीं होता। बस अस्तित्व की शुद्ध अनुभूति होती है। और यह बहुत शक्तिशाली हो सकता है। वास्तव में यह अत्यन्त शक्तिशाली अनुभव है। मान लो जब तुम बहुत युवा हो। विशेषकर जब तुम... मेरी उम्र के आस-पास हो। जब तुम पहली बार I AM का अनुभव करते हो, तो वह बहुत अलग होता है। हमने उससे पहले कभी वैसा अनुभव नहीं किया होता। इसलिए, उम्, मुझे नहीं पता कि उसे ‘अनुभव’ कहना भी चाहिए या नहीं। क्योंकि वहाँ कोई विचार नहीं होते। बस उपस्थिति होती है। लेकिन इस उपस्थिति की बहुत जल्दी, बहुत जल्दी — हाँ — सचमुच बहुत जल्दी — उम् — गलत व्याख्या कर दी जाती है, क्योंकि हमारी कर्म-प्रवृत्ति चीज़ों को द्वैतवादी और बहुत ठोस ढंग से समझने की ओर जाती है। इसलिए जब अनुभव होता है, तो उसकी व्याख्या बहुत अलग हो जाती है। और वही, वही, वही गलत व्याख्या वास्तव में एक अत्यन्त द्वैतवादी अनुभव रच देती है।” — से उद्धृत: https://docs.google.com/document/d/1MYAVGmj8JD8IAU8rQ7krwFvtGN1PNmaoDNLOCRcCTAw/edit?usp=sharingAtR (Awakening to Reality) बैठक, मार्च 2021 का प्रतिलेख (Transcript of AtR (Awakening to Reality) Meeting, March 2021)

https://docs.google.com/document/d/1MYAVGmj8JD8IAU8rQ7krwFvtGN1PNmaoDNLOCRcCTAw/edit?usp=sharing AtR (Awakening to Reality) बैठक, मार्च 2021 का प्रतिलेख (Transcript of AtR (Awakening to Reality) Meeting, March 2021)

अतिरिक्त स्रोत: बैठक-नोट्स (Meeting notes) · 28 अक्टूबर 2020 की AtR (Awakening to Reality) बैठक का प्रतिलेख (Transcript of AtR (Awakening to Reality) Meeting on 28 October 2020)

ठीक यही सर्वव्यापी उपस्थिति (all-pervasive Presence) फिर अंतिम पृष्ठभूमि समझ ली जाती है — अर्थात् वह होने का आधार (ground of being) जिस पर सभी प्रपंच आते-जाते हैं, जबकि वह स्वयं अपरिवर्तित और अप्रभावित बनी रहती है। इसे यहाँ और विस्तार से समझाया गया है: https://www.awakeningtoreality.com/2007/03/mistaken-reality-of-amness.html

2. प्रत्यक्ष पथ: ‘मैं’ को कम करके मत आँकिए

यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि आत्म-विचार का अभिन्न भाग होने वाली इस ‘नेति नेति’ प्रक्रिया को बौद्ध अनात्मा-शिक्षा के साथ गड्ड-मड्ड न किया जाए। ये दोनों अलग बातें हैं। नेति नेति और आत्म-विचार में उद्देश्य इस बात को साक्षात् करना है कि उपस्थिति-जागरूकता (Presence-Awareness) क्या है, आपका स्व (Self) क्या है, स्रोत (Source) क्या है। यहाँ स्व (Self) को कम करके नहीं आंका जा सकता। यदि आपका मार्ग आत्म-विचार और प्रत्यक्ष पथ है, तो बौद्ध अनात्मा/नैरात्म्य (No-Self) अथवा अनित्यता या अनात्मता (no-self) पर चिंतन को बाद के लिए अलग रखा जा सकता है।

जैसा कि जॉन टैन ने कहा (Thusness/PasserBy की 2009 DhO 1.0 पोस्टों में):

फोरम स्रोत: http://now-for-you.com/viewtopic.php?p=34809&highlight=#34809

“नमस्ते गैरी,

ऐसा प्रतीत होता है कि इस फोरम में साधकों के दो समूह हैं — एक क्रमिक पथ अपनाता है और दूसरा प्रत्यक्ष पथ। मैं यहाँ काफी नया हूँ, इसलिए संभव है कि मैं गलत हूँ।

मेरा आभास यह है कि आप क्रमिक पथ अपना रहे हैं, फिर भी प्रत्यक्ष पथ में कुछ बहुत महत्वपूर्ण का अनुभव कर रहे हैं — वह है ‘द्रष्टा’। जैसा कि Kenneth ने कहा: “आप यहाँ बहुत बड़ी बात को छू रहे हैं, Gary। यह साधना आपको मुक्त कर देगी।” लेकिन Kenneth की बात तब सार्थक होगी जब आप इस ‘मैं’ के प्रति जाग उठें। इसके लिए ‘यूरेका!’ जैसी प्राप्ति चाहिए। इस ‘मैं’ के प्रति जागृत होते ही आध्यात्मिक पथ स्पष्ट हो जाता है; वह बस इसी ‘मैं’ का प्रस्फुटन है।

दूसरी ओर, Yabaxoule जो वर्णन कर रहा है, वह क्रमिक पथ है, और इसलिए उसमें ‘I AM’ को कम करके दिखाया जा रहा है। आपको अपनी परिस्थितियों का स्वयं आकलन करना होगा। यदि आप प्रत्यक्ष पथ चुनते हैं, तो आप इस ‘मैं’ को कम करके नहीं आँक सकते; उलटे, आपको पूरे ‘आप’ को ‘अस्तित्व’ के रूप में पूर्णतः और सम्पूर्णता से अनुभव करना होगा। हमारी विशुद्ध प्रकृति की शून्यता-प्रकृति प्रत्यक्ष-पथ के साधकों के लिए तब प्रकट होगी जब वे अद्वैत-जागरूकता की ‘निशानरहित’, ‘केंद्ररहित’ और ‘सहज’ प्रकृति के आमने-सामने आएँगे।

शायद इन दोनों दृष्टिकोणों के मिलन-बिन्दु के बारे में थोड़ा-सा कहना आपके लिए सहायक होगा।

‘द्रष्टा’ के प्रति जागरण, साथ ही, ‘तात्कालिकता की आँख’ को भी खोल देता है; अर्थात् वह क्षमता जिसके द्वारा मनुष्य बिना किसी मध्यस्थता के, प्रत्यक्ष रूप से, अवधारणात्मक विचारों को भेदता है और जो कुछ अनुभव हो रहा है उसे देखता, महसूस करता, ग्रहण करता है। यह एक प्रकार का सीधा जानना है। आपको इस “बिना मध्यस्थ के प्रत्यक्ष” प्रकार की अनुभूति के प्रति गहरे रूप से सजग होना होगा — इतनी प्रत्यक्ष कि उसमें विषय-वस्तु का अन्तर न बचे; इतनी क्षणिक कि उसमें समय न बचे; इतनी सरल कि उसमें विचार न टिक सकें। यही वह ‘आँख’ है जो ‘ध्वनि’ बनकर ‘ध्वनि’ की समग्रता को देख सकती है। यही वही ‘आँख’ है जो विपश्यना करते समय चाहिए — अर्थात् ‘अनावृत’ होना। चाहे अद्वैत हो या विपश्यना, दोनों में इस ‘तात्कालिकता की आँख’ के खुलने की आवश्यकता होती है।”

3. अनात्मन्/नैरात्म्य (Anatman/No-Self) बनाम उपस्थिति (Presence) का अर्थ

एक बार “I AM” साक्षात् हो जाए, तो आगे चलकर अनात्मन्/नैरात्म्य (Anatman/No-Self) में भेदन सम्भव है। यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि अनात्मन् (Anatman) का अर्थ जागरूकता (Awareness) या दीप्ति (Luminosity) का निषेध या अभाव नहीं है। अनात्मन् की अंतर्दृष्टि “अंतर्निहितता की दृष्टि” को हटा देती है, और उस पृष्ठभूमि-रूपी “विषय” को “वस्तु” से अलग मानने वाली द्वैत-दृष्टि को भी मिटा देती है; तब जागरूकता का वास्तविक मुख इस रूप में प्रकट होता है कि वही अखिल ब्रह्माण्ड को भर देने वाली यह अखण्ड, सजीव और शून्य क्रियाशीलता है।

मैं इस भाग को यहाँ और विस्तार से नहीं खोलूँगा; आप इसके विवरण इन लेखों में पढ़ सकते हैं: https://www.awakeningtoreality.com/2007/03/thusnesss-six-stages-of-experience.html और https://www.awakeningtoreality.com/2017/11/anatta-and-pure-presence.html

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2008

AEN: हम्म, हाँ — Joan Tollifson ने कहा: यह खुला होना कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे विधिपूर्वक अभ्यास करके हासिल किया जाए। Toni कहती हैं कि कमरे की ध्वनियों को सुनने में कोई प्रयास नहीं लगता; सब कुछ यहीं है। “मैं” (और इसलिए कोई समस्या भी) तभी आती है जब विचार बीच में आकर कहता है: “क्या मैं इसे सही कर रहा हूँ? क्या यह ‘जागरूकता’ है? क्या मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ?” — और तभी अचानक वह व्यापक खुलापन गायब हो जाता है; मन एक कहानी और उससे उत्पन्न भावनाओं में उलझ जाता है।

Thusness: हाँ, जब सच्ची अंतर्दृष्टि उदित होती है और अभ्यास के रूप में सजगता का पूरा उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है, तब यह सजगता अंततः स्वाभाविक और सहज हो जाती है।

AEN: समझ गया।

Thusness: हाँ। ऐसा केवल तब होता है जब “मैं” की प्रवृत्ति अभी भी मौजूद हो। जब हमारी शून्यता-प्रकृति स्पष्ट हो जाती है, तब उस प्रकार के विचार उठते ही नहीं।

AEN: Toni Packer: “ऐसी ध्यान-साधना जो स्वतंत्र और सहज हो, बिना किसी लक्ष्य के, बिना किसी अपेक्षा के, वह शुद्ध सत्ता की अभिव्यक्ति है — जिसे कहीं जाना नहीं, कुछ पाना नहीं। जागरूकता को कहीं मुड़ने की ज़रूरत नहीं। यह यहीं है! सब कुछ जागरूकता में यहीं है! जब कल्पना से जागरण होता है, तो उसे करने वाला कोई नहीं होता। जागरूकता और विमान की ध्वनि यहाँ साथ-साथ हैं, बीच में कोई ऐसा नहीं जो उन्हें ‘कर’ रहा हो या उन्हें जोड़ने की कोशिश कर रहा हो। वे पहले से ही साथ हैं! चीज़ों (और लोगों) को अलग-अलग बनाए रखने वाली एकमात्र चीज़ ‘मैं’-परिपथ है, अपनी विभाजनकारी सोच के साथ। जब वह शांत हो जाता है, विभाजन रह ही नहीं जाते।”

AEN: समझ गया।

Thusness: लेकिन अंतर्दृष्टि के उदय के बाद भी, स्थिरीकरण से पहले, ऐसा फिर भी होता रहेगा।

AEN: समझ गया।

Thusness: कोई अलग “जागरूकता” और “ध्वनि” नहीं है। जागरूकता वही ध्वनि है। हम जागरूकता की एक निश्चित परिभाषा पकड़े रहते हैं, इसी कारण मन जागरूकता और ध्वनि को एक साथ नहीं देख पाता।

AEN: समझ गया।

Thusness: जब यह अंतर्निहित-दृष्टि (inherent view) मिट जाती है, तब बहुत स्पष्ट हो जाता है कि प्रकटता ही जागरूकता है; सब कुछ बिना किसी आवरण या आड़ के, सहजता से अनुभव होता है।

AEN: समझ गया।

Thusness: कोई व्यक्ति घंटी बजाता है — कोई “ध्वनि” अलग से उत्पन्न नहीं हो रही। केवल शर्तें हैं। “टोंग” — वही जागरूकता है।

AEN: समझ गया। आपका “ध्वनि उत्पन्न नहीं हो रही” से क्या मतलब है?

Thusness: जाओ, इसका अनुभव करो और खुद सोचो। समझाने का कोई फायदा नहीं।

AEN: कोई स्थानीय स्रोत नहीं, है न? यह किसी खास जगह से उत्पन्न नहीं होती?

Thusness: नहीं। चोट, घंटी, व्यक्ति, कान — जो-जो भी है — सब मिलकर “शर्तें” कहलाते हैं। ध्वनि के प्रकट होने के लिए वे आवश्यक हैं।

AEN: समझ गया। ओह, यानी ध्वनि बाहर कहीं स्वतंत्र रूप से मौजूद नहीं है; वह तो केवल शर्तों का उदय है।

Thusness: और न ही भीतर स्वतंत्र रूप से मौजूद है।

AEN: समझ गया।

Thusness: फिर मन सोचता है, “मैं सुन रहा हूँ।” या मन सोचता है कि मैं एक स्वतंत्र आत्मा हूँ। मेरे बिना “ध्वनि” नहीं है। लेकिन मैं “ध्वनि” नहीं हूँ। और मैं वह आधार-यथार्थ (ground reality) हूँ, वह भूमि हूँ, जिससे सब चीज़ें उठती हैं। यह केवल आधा-सच है। इससे भी गहरी प्राप्ति यह है कि कोई पृथक्करण नहीं है। हम “ध्वनि” को बाहरी मान लेते हैं, और उसे “शर्तों” के रूप में नहीं देखते। न ध्वनि वहाँ बाहर है, न यहाँ भीतर। देखने, विश्लेषण करने और समझने की हमारी विषय-वस्तु-द्वैतिक आदत ही इसे ऐसा बना देती है। तुम्हें शीघ्र ही इसका अनुभव होगा।

AEN: समझ गया। आपका मतलब समझ रहा हूँ।

Thusness: जाओ, ध्यान करो।

2022 का अद्यतन, Soh द्वारा:

जब लोग “कोई साक्षी नहीं” (no witness) पढ़ते हैं, तो वे गलती से सोच सकते हैं कि यह साक्षी या साक्षीकरण, अथवा अस्तित्व का निषेध है। यह गलत समझ है; उन्हें यह लेख पढ़ना चाहिए:



“कोई जागरूकता नहीं” का अर्थ जागरूकता के अस्तित्व का निषेध नहीं है (No Awareness Does Not Mean Non-Existence of Awareness)

आंशिक उद्धरण:

John Tan — 20 सितंबर 2014, 10:10 AM UTC+08

जब तुम 不思 (अविचार) प्रस्तुत करो, तब तुम्हें 觉 (जागरूकता) का निषेध नहीं करना चाहिए। बल्कि इस बात पर ज़ोर दो कि 觉 (जागरूकता) बिना रत्ती भर भी संदर्भ-ग्रहण, बिंदु-केंद्रिता, द्वैत या अपने भीतर समेट लेने की भावना के — कितनी सहज और कितनी अद्भुत रूप से प्रकट होती है... चाहे यहाँ, अभी, भीतर, बाहर... यह केवल अनात्मा, प्रतीत्यसमुत्पाद (DO) और शून्यता की प्राप्ति से ही आ सकता है, ताकि 相 (प्रकटता) की सहज स्वतःस्फूर्तता अपनी दीप्तिमान स्पष्टता में साकार हो सके।

Thusness: बौद्ध धर्म प्रत्यक्ष अनुभव पर अधिक ज़ोर देता है। उदय और निरोध से अलग कोई अलग ‘स्व’ नहीं है।

AEN: समझ गया।

Thusness: और इसी उदय और निरोध से “स्व” की शून्यता-प्रकृति देखी जाती है। साक्षीकरण है। वही साक्षीकरण ही अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति का साक्षी कोई अलग साक्षी नहीं है। यही बौद्ध धर्म है। मैंने हमेशा कहा है कि यह शाश्वत साक्षी के निषेध की बात नहीं है। पर वास्तव में वह शाश्वत साक्षी क्या है? वही शाश्वत साक्षी की सही समझ है।

AEN: हाँ, मैं भी यही सोच रहा था। तो यह कुछ-कुछ David Carse जैसा है, सही?

Thusness: जब प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया का “देखना” और उसका परदा हट जाए, तब।

AEN: शून्य, फिर भी दीप्तिमान। समझ गया।

Thusness: लेकिन जब कोई बुद्ध ने जो कहा उसे उद्धृत करता है, तो पहले यह देखना होगा कि क्या वह स्वयं समझता भी है या नहीं। क्या वह “शाश्वत साक्षी” को अद्वैत वेदान्त के अर्थ में देख रहा है?

AEN: शायद वह भ्रमित है।

Thusness: या क्या वह उसे प्रवृत्तियों से मुक्त होकर देख रहा है?

AEN: उसने कभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा, लेकिन मुझे लगता है कि उसकी समझ शायद कुछ वैसी ही है।

Thusness: इसलिए यदि उसे देखा ही नहीं गया, तो उद्धरण देने का कोई अर्थ नहीं।

AEN: समझ गया।

Thusness: अन्यथा यह फिर वही आत्मन्-दृष्टि दोहराना होगा। इसलिए अब तक तुम्हें बहुत स्पष्ट हो जाना चाहिए... और भ्रमित नहीं होना चाहिए।

AEN: समझ गया।

Thusness: मैंने तुम्हें क्या बताया है? तुमने अपने ब्लॉग में भी लिखा है। शाश्वत साक्षी क्या है? वही अभिव्यक्ति है... क्षण-क्षण का उदय। कोई उसे प्रवृत्तियों के साथ देखता है या उसकी वास्तविकता को? यह अधिक महत्वपूर्ण है। मैंने कितनी बार कहा है कि अनुभव सही है, लेकिन समझ गलत है। गलत दृष्टि। और यह भी कि धारणा अनुभव को कैसे प्रभावित करती है, और गलत समझ कैसे बनती है। इसलिए इधर-उधर से झटपट उद्धरण मत लाओ... बहुत-बहुत स्पष्ट रहो, और प्रज्ञा के साथ जानो कि क्या सही दृष्टि है और क्या गलत। नहीं तो तुम यह पढ़ोगे और उससे उलझ जाओगे। बात दीप्ति और जाननेपन (knowingness) के अस्तित्व का निषेध करने की नहीं है, बल्कि यह सही दृष्टि पाने की है कि चेतना वास्तव में क्या है। जैसे अद्वैत। मैंने कहा था, अभिव्यक्ति से अलग कोई साक्षी नहीं है; साक्षी वास्तव में अभिव्यक्ति ही है। यह पहला भाग है। और जब साक्षी ही अभिव्यक्ति है, तो यह कैसे है? “एक” वास्तव में “अनेक” कैसे है?

AEN: शर्तें?

Thusness: यह कहना कि “एक” ही “अनेक” है, स्वयं में पहले से गलत है। यह केवल व्यवहार-स्तर की अभिव्यक्ति है। वास्तव में ऐसा कोई “एक” नहीं है। और कोई “अनेक” भी नहीं। केवल उदय और निरोध है, जो शून्यता-प्रकृति के कारण है। और वही उदय-निरोध स्वयं स्पष्टता है। प्रपंचों से अलग कोई स्पष्टता नहीं है। यदि हम Ken Wilber की तरह अद्वैत का अनुभव करके भी आत्मन् की बात करें, तो अनुभव भले सही हो, समझ गलत है। यह “मैं हूँ” (I AM) जैसा ही है, बस अनुभव का एक ऊँचा रूप है। हाँ, वह अद्वैत है। दरअसल साधना का उद्देश्य इस 觉 (जुए; जागरूकता) का निषेध करना नहीं है। जिस तरह तुम समझा रहे थे, उससे ऐसा लगता था मानो “कोई जागरूकता नहीं” है। लोग कई बार तुम्हारी बात को गलत समझ लेते हैं; बात यह है कि इस 觉 (जागरूकता) को सही ढंग से समझा जाए ताकि इसे हर क्षण सहज रूप से जिया जा सके। लेकिन जब साधक सुनते हैं कि यह “वह” नहीं है, तो वे तुरंत चिंतित हो जाते हैं, क्योंकि यही उनकी सबसे मूल्यवान अवस्था होती है। लिखे गए सारे चरण इसी 觉 या जागरूकता के बारे में हैं। परंतु जागरूकता वास्तव में क्या है, यह ठीक से अनुभव नहीं किया जाता। क्योंकि उसे सही तरह से अनुभव नहीं किया गया, इसलिए हम कहते हैं कि “जिस जागरूकता को तुम बनाए रखना चाहते हो” वह उस प्रकार अस्तित्व में नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि जागरूकता है ही नहीं। बात यह नहीं कि जागरूकता नहीं है; बात यह है कि जागरूकता को विषय-वस्तु-दृष्टि से न समझा जाए, अंतर्निहित-दृष्टि से न समझा जाए। यही विषय-वस्तु की समझ का घटनाओं, क्रिया और कर्म में विलयन है। तब धीरे-धीरे समझ आता है कि “कोई वहाँ है” की अनुभूति वस्तुतः अंतर्निहित-दृष्टि की एक “संवेदना” भर है — अर्थात् एक “संवेदना”, एक “विचार”।

19 अक्टूबर 2008

AEN: अंतर्निहित-दृष्टि की? :P

Thusness: यह कैसे मुक्ति तक ले जाती है, उसके लिए प्रत्यक्ष अनुभव चाहिए। इसलिए मुक्ति “स्व” से स्वतंत्रता नहीं, बल्कि “अंतर्निहित-दृष्टि” से स्वतंत्रता है।

AEN: समझ गया।

Thusness: समझे? लेकिन दीप्ति का अनुभव करना महत्वपूर्ण है। आत्म-विचार के लिए यह बुरा नहीं है।

AEN: समझ गया।

27 मार्च 2010

AEN: वैसे, आपको क्या लगता है Lucky और Chandrakirti क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं?

Thusness: मेरी राय में वे उद्धरण सही तरह अनूदित नहीं हुए थे। जो समझना आवश्यक है, वह यह है कि “कोई मैं नहीं” का अर्थ साक्षी-चेतना का निषेध नहीं है। और “कोई प्रपंच नहीं” का अर्थ प्रपंच का निषेध नहीं है। यह केवल मानसिक संरचनाओं को विघटित करने के उद्देश्य से कहा जाता है।

AEN: समझ गया।

Thusness: जब तुम ध्वनि सुनते हो, तो तुम उसका निषेध नहीं कर सकते... कर सकते हो?

AEN: हाँ।

Thusness: तो फिर तुम किसका निषेध कर रहे हो? जब तुम उस साक्षी का अनुभव करते हो, जैसा तुमने अपने धागे में “अस्तित्व की निश्चितता” के रूप में वर्णित किया, तो इस प्राप्ति का निषेध कैसे कर सकते हो? तो “कोई मैं नहीं” और “कोई प्रपंच नहीं” का अर्थ क्या है?

AEN: जैसा आपने कहा, केवल मानसिक संरचनाएँ ही मिथ्या हैं... लेकिन चेतना का निषेध तो नहीं किया जा सकता?

Thusness: नहीं... मैं यह नहीं कह रहा हूँ।

2010

Thusness: बुद्ध ने पंच-स्कन्धों का कभी निषेध नहीं किया। केवल “स्वत्व” का निषेध किया। समस्या यह है कि “मैं” क्या अभिप्रेत है — और प्रपंचों तथा “मैं” दोनों की “अनंतर्निहित”, शून्य-प्रकृति से क्या तात्पर्य है। पर इसे गलत समझ लेना दूसरी बात है। क्या तुम साक्षीकरण का निषेध कर सकते हो? क्या तुम उस “अस्तित्व की निश्चितता” का निषेध कर सकते हो?

AEN: नहीं।

Thusness: तब उसमें कोई समस्या नहीं है। तुम अपने स्वयं के अस्तित्व का निषेध कैसे कर सकते हो? अस्तित्व का ही निषेध कैसे कर सकते हो? बिना किसी मध्यस्थ के, अस्तित्व की शुद्ध अनुभूति का प्रत्यक्ष अनुभव करने में कोई समस्या नहीं है। इस प्रत्यक्ष अनुभव के बाद तुम्हें अपनी समझ, अपनी दृष्टि, अपनी अंतर्दृष्टियों को परिष्कृत करना चाहिए — न कि अनुभव के बाद सही दृष्टि से भटककर अपनी गलत दृष्टि को और मजबूत करना चाहिए। तुम साक्षी का निषेध नहीं करते; तुम उसके प्रति अपनी अंतर्दृष्टि को परिष्कृत करते हो। अद्वैत का अर्थ क्या है? अवधारणाहीन होने का क्या अर्थ है? स्वस्फूर्तता का क्या अर्थ है? “अवैयक्तिकता” का पक्ष क्या है? दीप्ति क्या है?

Thusness: तुम कभी किसी ऐसी चीज़ का अनुभव नहीं करते जो अपरिवर्तनीय हो। बाद के चरण में, जब तुम अद्वैत का अनुभव करते हो, तब भी पृष्ठभूमि पर टिकने की यह प्रवृत्ति रहती है... और यही तुम्हारी प्रगति को TATA लेख में वर्णित प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टि तक जाने से रोक देगी (https://www.awakeningtoreality.com/2010/04/tada.html)। और उस स्तर की प्राप्ति के बाद भी तीव्रता की विभिन्न मात्राएँ रहती हैं।

AEN: अद्वैत?

Thusness: TADA (एक लेख) केवल अद्वैत से अधिक है... वह चरण 5–7 है।

AEN: समझ गया।

Thusness: यह सब अनात्मा और शून्यता की अंतर्दृष्टि के एकीकरण के बारे में है। क्षणभंगुरता में जीवंतता, रूपों के रूप में जागरूकता की “बुनावट और ताने-बाने” को महसूस करना — यह बहुत महत्वपूर्ण है। फिर शून्यता आती है। दीप्ति और शून्यता का समावेश। उस साक्षीकरण का निषेध मत करो; दृष्टि को परिष्कृत करो — यह बहुत महत्वपूर्ण है। अब तक तुमने साक्षीकरण के महत्व को सही ढंग से रेखांकित किया है। पहले की तरह नहीं, जब तुम लोगों को यह आभास देते थे कि तुम इस साक्षी-उपस्थिति का निषेध कर रहे हो। तुम केवल व्यक्तिकरण, वस्तुकरण और स्थायित्व-थोपने का निषेध करते हो, ताकि आगे बढ़कर हमारी शून्य-प्रकृति को साक्षात् कर सको।

Thusness: लेकिन MSN पर जो मैं तुम्हें बताता हूँ, उसे हमेशा पोस्ट मत कर दिया करो; नहीं तो कुछ ही समय में मैं किसी पंथ-नेता जैसा बन जाऊँगा।

2009

Thusness: कुछ ही समय में मैं किसी पंथ-नेता जैसा बन जाऊँगा।

AEN: समझ गया।

Thusness: अनात्मा कोई साधारण अंतर्दृष्टि नहीं है। जब हम पूर्ण पारदर्शिता के स्तर तक पहुँच पाते हैं, तब तुम इसके लाभों को जानोगे। अवधारणाहीनता, स्पष्टता, दीप्ति, पारदर्शिता, खुलापन, विशालता, विचार-शून्यता, अलौकिक-अकेन्द्रिकता... ये सब वर्णन बहुत अर्थहीन हो जाते हैं। सदा साक्षीकरण ही है — इसे गलत मत समझो। बात केवल इतनी है कि कोई उसकी शून्यता-प्रकृति को समझता है या नहीं।

Thusness: दीप्ति हमेशा है। कब ऐसा हुआ कि साक्षीकरण नहीं था? बात केवल दीप्ति की नहीं है; दीप्ति और शून्यता-प्रकृति दोनों की है।

2008

Thusness: यह साक्षीकरण तो हमेशा है... जिससे तुम्हें छुटकारा पाना है, वह विभक्त-बोध है। इसलिए मैंने कभी साक्षी-अनुभव और उसकी प्राप्ति का निषेध नहीं किया; केवल उसकी सही समझ पर ज़ोर दिया। साक्षी होना समस्या नहीं है; समस्या केवल यह है कि साक्षी क्या है, इसकी गलत समझ। अर्थात् साक्षीकरण में द्वैत देखना। या “स्व” और “अन्य”, विषय-वस्तु विभाजन देखना। यही समस्या है। तुम इसे साक्षीकरण कहो या जागरूकता — उसमें “स्व” का भाव नहीं होना चाहिए। हाँ, साक्षीकरण।

Thusness: साक्षीकरण में वह सदैव अद्वैत है। जब “साक्षी” की स्थिति होती है, तब भी एक साक्षी और एक साक्ष्य-वस्तु का विचार उपस्थित रहता है।

Thusness: जब पर्यवेक्षक है, तब “कोई पर्यवेक्षित नहीं” जैसी बात नहीं हो सकती। जब यह प्राप्त होता है कि केवल साक्षीकरण है, तब न पर्यवेक्षक रहता है, न पर्यवेक्षित; वह सदा अद्वैत है।

Thusness: यही कारण है कि जब Genpo आदि कहते हैं कि कोई साक्षी नहीं, केवल साक्षीकरण है — फिर भी वे पीछे हटकर देखने और अवलोकन करने की शिक्षा देते हैं — तो मैंने कहा कि वहाँ पथ दृष्टि से विचलित हो जाता है।

AEN: समझ गया।

Thusness: जब तुम लोगों को “साक्षी का अनुभव करो” सिखाते हो, तो तुम उन्हें वही सिखा रहे होते हो।

Thusness: यह विषय-वस्तु-विभाजन के अभाव के बारे में नहीं है। तुम किसी को उस साक्षी का अनुभव करना सिखा रहे हो।

2008

Thusness: “मैं हूँ” (I AM) की अंतर्दृष्टि का पहला चरण। क्या तुम “मैं हूँ”-पन (I AMness) के अनुभव का निषेध कर रहे हो?

AEN: आपका मतलब उस पोस्ट में? नहीं। अधिक तो यह “मैं हूँ” (I AM) की प्रकृति के बारे में है, सही?

Thusness: तो फिर क्या नकारा जा रहा है?

AEN: द्वैतपूर्ण समझ?

Thusness: हाँ, उस अनुभव की गलत समझ ही नकारी जा रही है। ठीक जैसे किसी फूल की “लाली”।

AEN: समझ गया।

Thusness: वह अत्यन्त सजीव लगती है, वास्तविक लगती है, और ऐसा प्रतीत होता है मानो वह फूल की अपनी हो। वह केवल ऐसा दिखाई देती है; वास्तव में वैसी नहीं है। जब हम विषय-वस्तु-द्वैत के रूप में देखते हैं, तब “विचार हैं, पर विचारक नहीं”; “ध्वनि है, पर सुनने वाला नहीं”; और “पुनर्जन्म है, पर पुनर्जन्म लेने वाली कोई स्थायी आत्मा नहीं” — यह सब उलझन पैदा करता है। यह इसलिए उलझनपूर्ण लगता है क्योंकि चीज़ों को अंतर्निहित रूप से देखने की हमारी गहरी जमी हुई दृष्टि है, और द्वैत उसी “अंतर्निहित” देखने का एक उपसमुच्चय है। तो समस्या क्या है?

AEN: समझ गया। वे गहरे बैठे हुए दृष्टिकोण?

Thusness: हाँ। समस्या क्या है?

AEN: वापस वही?

Thusness: समस्या यह है कि दुःख का मूल कारण इसी गहरे जमे हुए दृष्टिकोण में निहित है। हम खोजते हैं, और आसक्त होते हैं, क्योंकि ये दृष्टियाँ मौजूद हैं। यही “दृष्टि” और “चेतना” का संबंध है। इससे बच निकलना संभव नहीं। अंतर्निहित-दृष्टि के साथ “मैं” और “मेरा” अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते हैं। सदैव “का है” या “से संबंधित है” की भावना रहती है — जैसे “लाली” फूल की है। इसलिए, तमाम अतीन्द्रिय अनुभवों के बावजूद, सम्यक् समझ के बिना मुक्ति नहीं है।

Soh: साथ ही, Awakening to Reality (AtR) समुदाय पहले I AM को साकार करने के लिए आत्म-अन्वेषण का अभ्यास करने की अनुशंसा करता है, और उसके बाद अद्वैत, अनात्मा (Anatta) और शून्यता की ओर आगे बढ़ने की। इसलिए यह पोस्ट I AM का निषेध नहीं है; यह केवल उपस्थिति (Presence) की अद्वैत, अनात्मा (Anatta) और शून्य प्रकृति को आगे खोलने की आवश्यकता की ओर संकेत करती है।

अनात्मा (Anatta) का साक्षात्कार उस अद्वैत उपस्थिति (non-dual Presence) के स्वाद को सभी अभिव्यक्तियों, स्थितियों और प्रत्ययों में, कृत्रिमता, प्रयास, संदर्भ-ग्रहण, केंद्र या सीमाओं की रत्ती-भर छाप के बिना, ले आने के लिए अत्यंत आवश्यक है। जिसने स्व/I AM/ईश्वर (Self/I AM/God) का साक्षात्कार किया है, उसके लिए यह स्वप्न-सिद्धि है; यही कुंजी है जो उसे जीवन के प्रत्येक क्षण में, बिना प्रयास, पूर्ण परिपक्वता तक ले आती है।

यही निर्मल उपस्थिति (Pure Presence) की पारदर्शकता और अपरिमेय उज्ज्वल दीप्ति को सब कुछ में ले आता है; यह अद्वैत अनुभव की कोई जड़ या मंद अवस्था नहीं है।

यही इस अनुभव को संभव बनाता है:

“अभी उपस्थिति क्या है? सब कुछ... लार का स्वाद लो, गंध लो, सोचो — वह क्या है?

उँगली चटकाओ, गाओ। सारी सामान्य गतिविधि, शून्य प्रयास; इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। फिर भी यह पूर्ण सिद्धि है।

गूढ़ भाषा में कहें तो: ईश्वर (God) को खाओ, ईश्वर (God) को चखो, ईश्वर (God) को देखो, ईश्वर (God) को सुनो... यही पहली बात थी जो मैंने कुछ वर्ष पहले Mr. J को तब बताई थी जब उसने पहली बार मुझे संदेश भेजा था 😂 यदि दर्पण है, तो यह संभव नहीं। यदि स्पष्टता शून्य नहीं है, तो यह संभव नहीं। जरा भी प्रयास आवश्यक नहीं। क्या तुम इसे महसूस करते हो? मेरे पैरों को पकड़ना ऐसा है मानो मैं उपस्थिति (Presence) को पकड़ रहा हूँ! क्या तुम्हारे पास यह अनुभव पहले से है? जब दर्पण नहीं है, तब संपूर्ण अस्तित्व केवल प्रकाश-ध्वनियाँ-संवेदनाएँ है, एकल उपस्थिति के रूप में। उपस्थिति (Presence) उपस्थिति (Presence) को पकड़ रही है। पैरों को पकड़ने की गति उपस्थिति (Presence) है... पैरों को पकड़ने की संवेदना उपस्थिति (Presence) है... मेरे लिए तो टाइप करना या पलक झपकाना भी ऐसा ही है। गलत समझे जाने के भय से, इसके बारे में मत बोलो। सम्यक् समझ यह है कि कोई एक उपस्थिति (Presence) नहीं है, क्योंकि जाननेपन (knowingness) की प्रत्येक इन्द्रियगत अनुभूति भिन्न है। नहीं तो Mr. J कहेगा कि यह बकवास है... जब दर्पण है, यह संभव नहीं। लगता है मैंने लगभग दस वर्ष पहले longchen (Sim Pern Chong) को इस बारे में लिखा था।” - John Tan

“‘I Am’ के 15 वर्षों के बाद इस बिंदु तक पहुँचना सचमुच बड़ा आशीर्वाद है। सावधान रहो कि आदतन प्रवृत्तियाँ जो खो चुकी हैं उसे वापस लेने की पूरी कोशिश करेंगी। कुछ न करने के अभ्यस्त हो जाओ। ईश्वर (God) को खाओ, ईश्वर (God) को चखो, ईश्वर (God) को देखो और ईश्वर (God) को छुओ।

बधाई।” – John Tan ने Sim Pern Chong को 2006 में I AM से no-self में उसकी प्रारम्भिक सफलता के बाद कहा, https://www.awakeningtoreality.com/2013/12/part-2-of-early-forum-posts-by-thusness_3.html

“रोचक टिप्पणी, Mr. J. साक्षात्कार के बाद… बस ईश्वर (God) को खाओ, ईश्वर (God) को साँस लो, ईश्वर (God) को सूँघो और ईश्वर (God) को देखो… अंत में पूरी तरह अनास्थापित हो जाओ और ईश्वर (God) को मुक्त करो।” - John Tan, 2012

"

“अनात्मा (Anatta) का उद्देश्य हृदय का पूर्ण-विस्फुट अनुभव कराना है — असीम, पूर्ण, अद्वैत और अ-स्थानिक रूप से। Jax को जो मैंने लिखा था, उसे फिर पढ़ो।

हर स्थिति में, सभी प्रत्ययों में, सभी घटनाओं में। उद्देश्य अनावश्यक कृत्रिमता को समाप्त करना है ताकि हमारा सार बिना आवरण के व्यक्त हो सके।

Jax हृदय की ओर संकेत करना चाहता है, पर अद्वैत ढंग से व्यक्त नहीं कर पाता... क्योंकि द्वैत में सार साकार नहीं हो सकता। सभी द्वैतात्मक व्याख्याएँ मन-निर्मित हैं। क्या तुम Mahākāśyapa की मुस्कान को जानते हो? क्या तुम 2500 वर्ष बाद भी उस मुस्कान के हृदय को छू सकते हो?

मन और शरीर को पूर्णतः खो देना होगा — पूरे मन और पूरे शरीर से उस सार को महसूस करके, जो 心 (Mind) है। फिर भी 心 (Mind) भी 不可得 (ungraspable/unobtainable) है। उद्देश्य 心 (Mind) का निषेध करना नहीं है, बल्कि उस पर कोई सीमा या द्वैत न थोपना है ताकि 心 (Mind) पूर्ण रूप से प्रकट हो सके।

इसलिए 缘 (conditions) को न समझना 心 (Mind) को सीमित करना है। 缘 (conditions) को न समझना उसकी अभिव्यक्तियों पर सीमा लगाना है। तुम्हें 无心 (No-Mind) को साकार करके 心 (Mind) को पूर्ण रूप से अनुभव करना होगा, और 不可得 (ungraspable/unobtainable) की प्रज्ञा को पूर्णतः अपनाना होगा।” - John Tan/Thusness, 2014

"जो व्यक्ति पूर्ण ईमानदारी में होता है, वह यह जान लेगा कि जब भी वह ‘ऐसापन’ से बाहर कदम रखने की कोशिश करता है — हालाँकि वह ऐसा कर नहीं सकता — तो वहाँ पूर्ण भ्रम उत्पन्न होता है। सत्य तो यह है कि वह वास्तविकता में किसी भी चीज़ को जान ही नहीं सकता।

यदि हमने पर्याप्त भ्रम और भय का सामना नहीं किया है, तो ‘ऐसापन’ की पूरी सराहना नहीं हो पाएगी।

“मैं विचार नहीं हूँ, मैं भावनाएँ नहीं हूँ, मैं रूप नहीं हूँ, मैं इनमें से कुछ भी नहीं हूँ; मैं परम शाश्वत साक्षी (Ultimate Eternal Witness) हूँ।” — यही अंतिम तादात्म्य है।

जिन क्षणभंगुर चीज़ों को हम ठेलकर दूर कर देते हैं, वही तो वह उपस्थिति है जिसकी हम तलाश कर रहे हैं; बात यह है कि कोई ‘होनेपन’ में जी रहा है या निरंतर तादात्म्य में। होनेपन बहता है, और तादात्म्य टिककर जड़ हो जाता है। तादात्म्य वह हर प्रयास है जिसमें कोई उसकी प्रकृति के पहले से ही अद्वैत होने को जाने बिना ‘एकत्व’ में लौटना चाहता है।

“मैं हूँ” (I AM) जानना नहीं है। “मैं हूँ” (I AM) होना है। विचार होकर होना, भावना होकर होना, रूप होकर होना… आरम्भ से कोई अलग ‘मैं’ है ही नहीं।

या तो तुम हो ही नहीं, या तुम सब कुछ हो।" - Thusness, 2007, 2004 से 2012 के बीच Thusness की वार्ताएँ (Thusness's Conversations Between 2004 to 2012)

...
जो लोग अभी भी ‘मैं हूँ’ की अनुभूति के लिए आत्म-विचार का अभ्यास कर रहे हैं, वे इस बात को ध्यान में रखें:

John Tan ने 2009 में Dharma Overground पर लिखा था,

“हाय Gary,

ऐसा लगता है कि इस फ़ोरम में साधकों के दो समूह हैं — एक क्रमिक पथ अपनाने वाला और दूसरा प्रत्यक्ष पथ। मैं यहाँ काफ़ी नया हूँ, इसलिए संभव है कि मैं गलत हूँ।

मेरी समझ यह है कि तुम क्रमिक पथ अपना रहे हो, फिर भी प्रत्यक्ष पथ में किसी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण चीज़ का अनुभव कर रहे हो, और वह है ‘द्रष्टा’। जैसा Kenneth ने कहा, “Gary, तुम किसी बहुत बड़ी चीज़ पर पहुँचे हो। यह साधना तुम्हें मुक्त कर देगी।” लेकिन Kenneth ने जो कहा, उसके लिए तुम्हें इस ‘मैं’ में जागना होगा। इसके लिए उस तरह की ‘यूरेका!’ जैसी साक्षात्कार-घटना चाहिए। इस ‘मैं’ में जागो, और आध्यात्मिकता का पथ स्पष्ट हो जाता है; वह बस इसी ‘मैं’ का क्रमशः उद्घाटन है।

दूसरी ओर, Yabaxoule जो वर्णन कर रहा है, वह क्रमिक पथ है, और इसलिए वहाँ ‘मैं हूँ’ को कम करके दिखाया जाता है। तुम्हें अपनी परिस्थितियों को स्वयं परखना होगा। यदि तुम प्रत्यक्ष पथ चुनते हो, तो इस ‘मैं’ को कम करके नहीं देख सकते; बल्कि तुम्हें पूरे और सम्पूर्ण रूप से समूचे ‘तुम्हें’ ‘अस्तित्व’ के रूप में अनुभव करना होगा। हमारे निर्मल स्वभाव की शून्यता-प्रकृति प्रत्यक्ष पथ के साधकों के लिए तब प्रकट होगी, जब वे अद्वैत जागरूकता की ‘चिह्नहीन’, ‘केंद्रहीन’ और ‘प्रयासहीन’ प्रकृति के आमने-सामने आएँगे।

शायद इन दोनों पथों का जहाँ मिलन होता है, उसके बारे में थोड़ा कहना तुम्हारे लिए सहायक होगा।

‘द्रष्टा’ में जागरण के साथ ही ‘तात्कालिक प्रत्यक्षता की आँख’ खुलती है; अर्थात् ऐसी क्षमता, जो विचारों को भेदकर और अनुभूति, संवेदना, प्रत्यक्षीकरण को बिना किसी मध्यस्थ के सीधे-सीधे अनुभव कर सके। यह प्रत्यक्ष जानना है। तुम्हें इस “बिना किसी मध्यस्थ के प्रत्यक्ष” प्रकार की अनुभूति से गहराई से परिचित होना होगा — इतनी प्रत्यक्ष कि विषय-वस्तु का अंतराल न बचे, इतनी तात्कालिक कि समय न बचे, इतनी सरल कि विचार न बचे। यही वह ‘आँख’ है जो ‘ध्वनि’ को ‘ध्वनि होकर’ संपूर्ण रूप से देख सकती है। यही वही ‘आँख’ है जिसकी आवश्यकता विपश्यना करते समय भी होती है — अर्थात् ‘अनावृत प्रत्यक्षता’ में होना। चाहे अद्वैत हो या विपश्यना, दोनों में इसी ‘तात्कालिक प्रत्यक्षता की आँख’ का खुलना आवश्यक है।”


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ऊपर दिए गए “मैं हूँ”-भाव (I AMness) के वर्णन के चीनी संस्करण में, John Tan ने 2007 में लिखा था,

真如:当一个修行者深刻地体验到“我/我相”的虚幻时,虚幻的“我相”就有如溪河溶入大海,消失于无形。此时也即是大我的生起。此大我清澈灵明,有如一面虚空的镜子觉照万物。一切的来去,生死,起落,一切万事万物,缘生缘灭,皆从大我的本体内幻现。本体并不受影响,寂然不动,无来亦无去。此大我即是梵我/神我。

: 修行人不可错认这便是真正的佛心啊!由于执着于觉体与甚深的业力,修行人会难以入眠,严重时会得失眠症,而无法入眠多年。"

जब कोई साधक “स्व या स्व-छवि” की मायिकता का गहरा अनुभव करता है, तो वह मायिक “स्व-छवि” ऐसे विलीन हो जाती है जैसे कोई नदी महासागर में मिलकर बिना किसी निशान के लुप्त हो जाए। यही क्षण “महान स्व” (Great Self) के उदय का भी क्षण है। यह महान स्व (Great Self) निर्मल, रहस्यमय रूप से जीवंत, स्वच्छ और प्रकाशमान है—मानो शून्य-आकाश जैसा दर्पण हो जो दस हज़ार वस्तुओं को प्रतिबिंबित कर रहा हो। आना-जाना, जन्म-मरण, उठान-पतन, दस हज़ार घटनाएँ और दस हज़ार रूप—सब केवल कारण-शर्तों के अनुसार महान स्व (Great Self) के आधार-तल के भीतर से मायिक अभिव्यक्तियों की तरह प्रकट होकर लुप्त होते हैं। यह आधार-तल कभी प्रभावित नहीं होता; वह निश्चल है, अचल है, न आता है न जाता है। यही महान स्व (Great Self), आत्मन्-ब्रह्मन् (Atman-Brahman), ईश्वर-स्व (God-Self) है।

टिप्पणी: साधकों को इसे सच्चे बुद्ध-मन (Buddha Mind) के रूप में भूलवश नहीं लेना चाहिए! जागरूकता को किसी सार-तत्त्व की तरह पकड़ने की कर्म-शक्ति के कारण, साधक को नींद में प्रवेश करने में कठिनाई हो सकती है, और गंभीर दशा में अनिद्रा तक हो सकती है—वर्षों तक सो न पाने की स्थिति भी।”

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John Tan, 2008:

क्षणभंगुरता (The Transience)


उदित होना और लय होना—इसी को क्षणभंगुरता कहते हैं,
आदि से ही यह स्वयं-प्रकाशित और स्वयं-सिद्ध है।
किन्तु विभाजन करने वाली कर्म-प्रवृत्ति के कारण,
मन ‘चमक’ को निरंतर उदय-लय से अलग कर देता है।
यह कर्मजन्य भ्रम ‘चमक’ को गढ़ देता है,
एक ऐसी वस्तु में जो स्थायी और अपरिवर्तनीय मानी जाती है।
वह ‘अपरिवर्तनीय’, जो अकल्पनीय रूप से वास्तविक प्रतीत होता है,
केवल सूक्ष्म विचार और स्मरण में ही अस्तित्व रखता है।
वस्तुतः, प्रकाशमानता स्वयं शून्य है,
वह पहले से ही अजन्मा, असंस्कृत और सर्वव्यापी है।
इसलिए उदय और लय से मत डरो।

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ऐसा कोई “यह” नहीं जो किसी दूसरे “यह” से अधिक “यह” हो।
यद्यपि विचार स्पष्टता से उठता और गिरता है,
हर उदय और लय उतना ही पूर्ण रहता है जितना वह हो सकता है।

जो शून्यता-स्वभाव अभी और यहीं निरंतर प्रकट हो रहा है,
उसने किसी भी प्रकार अपनी स्वयं की प्रकाशमानता का निषेध नहीं किया है।

यद्यपि अद्वैत स्पष्ट रूप से देखा जाता है,
ठहरे रहने की प्रवृत्ति अब भी सूक्ष्म रूप से अंधा कर सकती है।
राहगीर की तरह जो गुज़रता है और पूरी तरह चला जाता है।
पूर्णतः मर जाओ
और इस शुद्ध उपस्थिति (Pure Presence), इसकी अ-स्थानिकता के साक्षी बनो।


~ Thusness/Passerby


और इसलिए... “जागरूकता” अब क्षणभंगुर मन से अधिक “विशेष” या “परम” नहीं रही।

लेबल:

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Dan Berkow का एक अच्छा लेख भी है; यहाँ उस लेख का एक आंशिक अंश दिया जा रहा है:

https://www.awakeningtoreality.com/2009/04/this-is-it-interview-with-dan-berkow.html

Dan:

यह कहना कि “पर्यवेक्षक नहीं है”, यह नहीं कहता कि कोई वास्तविक चीज़ गायब है। जो समाप्त हुआ है—जैसा कि “अभी” के मामले में होता है—वह है वह वैचारिक स्थिति, जिस पर “एक पर्यवेक्षक” प्रक्षेपित किया जाता है, और उसके साथ-साथ विचार, स्मृति, अपेक्षाओं और लक्ष्यों का सहारा लेकर उस स्थिति को बनाए रखने का प्रयास भी।

यदि “यहाँ” ही “अभीपन” है, तो किसी भी दृष्टिकोण को, क्षण-प्रतिक्षण भी, “मैं” के रूप में नहीं पहचाना जा सकता। वास्तव में, मनोवैज्ञानिक समय—जो तुलना से निर्मित होता है—समाप्त हो चुका है। इसलिए केवल “यह अविभाजित वर्तमान क्षण” है, यहाँ तक कि

इस क्षण से अगले क्षण में जाने की कल्पित अनुभूति भी नहीं।

क्योंकि अवलोकन का वह वैचारिक बिंदु ही नहीं रहा, इसलिए जो देखा जाता है उसे उन वैचारिक श्रेणियों में “फिट” नहीं किया जा सकता जो पहले धारणा के “मैं-केंद्र” के रूप में बनाए रखी गई थीं। इन सभी श्रेणियों की सापेक्षता “देखी” जाती है, और वह यथार्थ जो विचार या अवधारणा से विभक्त नहीं है, बस वैसे ही विद्यमान है।

पहले जो जागरूकता “पर्यवेक्षक” के रूप में स्थित थी, उसका क्या हुआ? अब जागरूकता और प्रत्यक्षीकरण अविभाजित हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी वृक्ष का अनुभव हो रहा है, तो “पर्यवेक्षक” “उस वृक्ष का हर पत्ता” है। वस्तुओं से अलग कोई पर्यवेक्षक अथवा अलग जागरूकता नहीं है,

और न ही जागरूकता से अलग कोई वस्तुएँ हैं। जो उदित होता है वह है: “यही है”। सारे प्रवचन, संकेत, बुद्धिमत्तापूर्ण कथन, “विशेष ज्ञान” के निहितार्थ, सत्य की निडर खोज, और विरोधाभासी रूप से चतुर अंतर्दृष्टियाँ—ये सब अनावश्यक और अप्रासंगिक दिखाई देते हैं। “यह”, ठीक जैसा है, “वही” है। “इस” में कुछ और जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं; वास्तव में कोई “आगे” भी नहीं है—और न ही पकड़कर रखने या दूर करने के लिए कोई “वस्तु” है।

Gloria: Dan, इस बिंदु पर कोई भी प्रतिपादन अनावश्यक लगता है। यह ऐसा क्षेत्र है जिसकी ओर केवल मौन और शून्यता से संकेत किया जा सकता है, और वह भी कुछ ज़्यादा ही है। यहाँ तक कि “I AM” कहना भी इसे और उलझाता है; वह जागरूकता पर अर्थ की एक और परत चढ़ा देता है। “कर्ता नहीं है” (अकर्ता) कहना भी एक प्रकार का प्रतिपादन ही है, है न? तो क्या इस पर आगे चर्चा करना असंभव है?

Dan:

तुमने यहाँ दो बिंदु उठाए हैं, Glo, जिन पर बात करना सार्थक लगता है: “I AM” का उल्लेख न करना और “अकर्ता” (nondoer) की शब्दावली का उपयोग करना—या शायद, मुझे लगता है, “अ-पर्यवेक्षक” (nonobserver) शब्द अधिक उपयुक्त हो सकता है।

“I AM” का प्रयोग न करना, और उसके स्थान पर “शुद्ध जागरूकता” कहना, यह कहने का एक तरीका है कि जागरूकता किसी “मैं” पर केंद्रित नहीं है, और न ही वह अपने संबंध में होने और न-होने के भेद से जुड़ी है।

वह स्वयं को किसी भी तरह वस्तु नहीं बना रही, इसलिए जिन अवस्थाओं में वह है उनके बारे में उसके पास कोई अवधारणा भी नहीं होगी—“I AM” तभी उपयुक्त बैठता है जब उसके मुकाबले “कुछ और है”, या “मैं नहीं हूँ” हो। जब “कुछ और” भी नहीं और “मैं-नहीं” भी नहीं, तब “I AM” प्रकार की जागरूकता नहीं रह सकती। “शुद्ध जागरूकता” की भी इसी तरह आलोचना की जा सकती है—क्या कोई “अशुद्ध” जागरूकता है? क्या जागरूकता के अलावा कुछ और है? इसलिए “शुद्ध जागरूकता”, या केवल “जागरूकता” जैसे शब्द संवाद करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, इस समझ के साथ कि शब्द हमेशा द्वैतात्मक विरोधों की ओर संकेत करते हैं।

“पर्यवेक्षक नहीं है” (the observer is not), या “कर्ता नहीं है” (the doer is not) जैसी संबंधित अवधारणाएँ उन मान्यताओं पर प्रश्न उठाने के तरीके हैं जो प्रत्यक्षीकरण को संचालित करती हैं। जब उस मान्यता पर पर्याप्त रूप से प्रश्न उठा लिया जाता है, तब उस प्रतिपादन की आवश्यकता नहीं रहती। यही “काँटे से काँटा निकालने” का सिद्धांत है। जब कोई सकारात्मक दावा किया ही नहीं गया, तब किसी नकार का कोई विशेष महत्व नहीं रहता। “सरल जागरूकता” (simple awareness) ने कभी यह सोचा ही नहीं कि कोई पर्यवेक्षक या कर्ता उपस्थित है या नहीं।

स्रोत लिंक: अतिरिक्त बैठक-टिप्पणियाँ (Additional meeting notes)


मेरे ध्यान में आया कि यह वीडियो https://www.youtube.com/watch?v=vAZPWu084m4 “वेदान्तिक स्व और बौद्ध अनात्मा/नैरात्म्य (Vedantic Self and Buddhist Non-Self | Swami Sarvapriyananda)” इंटरनेट और मंचों पर बहुत प्रसारित हो रहा है और काफ़ी लोकप्रिय है। मैं स्वामीजी के तुलनात्मक प्रयासों का आदर करता हूँ, लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं कि चन्द्रकीर्ति का विश्लेषण अद्वैत चेतना को अंतिम, अविभाज्य और अविखंडित यथार्थ के रूप में छोड़ देता है। संक्षेप में, स्वामी सर्वप्रियानन्द यह सुझाते हैं कि सात-भागीय विश्लेषण द्वैतवादी सांख्य परंपराओं के साक्षी या आत्मन् जैसे अलग, शाश्वत स्व (Self) को विघटित करता है, पर अद्वैत वेदान्त के अद्वैत ब्रह्मन् को अप्रभावित छोड़ देता है; उनकी उपमा यह है कि चेतना और रूप सोने और हार की तरह हैं—अद्वैत हैं, कोई अलग साक्षी नहीं। इस दृष्टि में यह अद्वैत अधिष्ठान, अर्थात् “सब कुछ सोना ही है” जैसी बात, सबका वास्तविक द्रव्य बनकर सचमुच विद्यमान रहता है।

इस वीडियो के कारण मुझे लगा कि John Tan, मेरे और कुछ अन्य लोगों के उद्धरणों के संकलन वाले अपने ब्लॉग-लेख को अद्यतन करना चाहिए: 3) “बुद्ध-स्वभाव ‘I AM’ नहीं है” (Buddha Nature is NOT “I Am”) https://www.awakeningtoreality.com/2007/03/mistaken-reality-of-amness.html। यह अद्यतन मेरे लिए आवश्यक था, क्योंकि मैंने यह लेख कई लोगों को ऑनलाइन भेजा है; परिस्थितियों के अनुसार प्रायः मैं 1) Thusness/PasserBy के ज्ञानोदय के सात चरण (Thusness/PasserBy's Seven Stages of Enlightenment) https://www.awakeningtoreality.com/2007/03/thusnesss-six-stages-of-experience.html और संभवतः 2) अनात्मा (Anatta/No-Self), शून्यता, महा और साधारणता तथा स्वस्फूर्त परिपूर्णता पर (On Anatta (No-Self), Emptiness, Maha and Ordinariness, and Spontaneous Perfection) https://www.awakeningtoreality.com/2009/03/on-anatta-emptiness-and-spontaneous.html भी भेजता हूँ। सामान्यतः प्रतिक्रियाएँ बहुत सकारात्मक रही हैं और अनेक लोगों को लाभ हुआ है। स्पष्टता के लिए मुझे इसे पहले ही अद्यतन कर देना चाहिए था।

मुझे अद्वैत वेदान्त और हिंदू धर्म की अन्य शालाओं—चाहे वे द्वैतवादी हों या अद्वैतवादी—के प्रति, और विभिन्न धर्मों में पाए जाने वाले परम स्व (Self) या अद्वैत चेतना पर आधारित अन्य रहस्यवादी परंपराओं के प्रति भी, गहरा सम्मान है। फिर भी बौद्ध बल तीन धर्म-मुद्राओं पर है: अनित्यता, दुःख और अनात्मा/नैरात्म्य (No-Self)। साथ ही शून्यता और प्रतीत्यसमुत्पाद पर भी। इसलिए हमें अनुभूतिगत साक्षात्कारों के स्तर पर भेदों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करना होगा। आचार्य महायोगी श्रीधर राणा रिनपोछे ने भी कहा: “मुझे फिर दोहराना होगा कि दोनों प्रणालियों को ठीक से पूरी तरह समझने के लिए दोनों प्रणालियों का यह भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसका उद्देश्य किसी भी प्रणाली को नीचा दिखाना नहीं है।” — https://www.awakeningtoreality.com/search/label/Acharya%20Mahayogi%20Shridhar%20Rana%20Rinpoche

यह वे अतिरिक्त अनुच्छेद हैं जिन्हें मैंने https://www.awakeningtoreality.com/2007/03/mistaken-reality-of-amness.html में जोड़ा:

I AM और अनात्मा (Anatta) साक्षात्कारों के बीच एक चरण है जिससे John Tan, मैं और कई अन्य गुज़रे हैं। यह One Mind का चरण है, जहाँ अद्वैत ब्रह्मन् को सभी रूपों का द्रव्य या अधिष्ठान जैसा देखा जाता है—सभी रूपों से अद्वैत, फिर भी अपरिवर्तनीय और स्वतंत्र अस्तित्व वाला, जो कुछ भी और सब कुछ बनकर रूपान्तरित होता प्रतीत होता है। उपमा सोने और हार की है: सोने से हर आकार के हार बन सकते हैं, पर वास्तव में सभी रूप और आकार केवल सोने के द्रव्य से बने हैं। अंतिम विश्लेषण में सब कुछ केवल ब्रह्मन् है; वह अनेक वस्तुओं की तरह केवल तब प्रतीत होता है जब उसका मूल यथार्थ—अद्वैत चेतना की शुद्ध एकरूपता—बहुलता के रूप में गलत प्रत्यक्षित होता है। इस चरण में चेतना को अब प्रकटताओं से अलग द्वैतवादी साक्षी नहीं माना जाता, क्योंकि सभी प्रकटताएँ शुद्ध अद्वैत चेतना के एक द्रव्य के रूप में ही ग्रहण होती हैं, जो सब कुछ बनकर रूपान्तरित हो रहा है।

ऐसे द्रव्यवादी अद्वैतवाद—“सोना”, “ब्रह्मन्”, “अपरिवर्तनीय शुद्ध अद्वैत चेतना”—को भी अनात्मा साक्षात्कार में भेदकर देखा जाता है। John Tan ने पहले कहा था: “स्व (Self) सांवृतिक है। दोनों को गड्ड-मड्ड नहीं करना चाहिए; अन्यथा व्यक्ति चित्त-मात्र की बात कर रहा है।” और, “[Soh: विघटित करना] छोटे स्व (self) और बड़े स्व (Self) को जागरूकता से अलग करना होगा। फिर जागरूकता भी सभी प्रपंचों और स्वभाव से स्वतंत्रता में विघटित होती है।”

इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए ये अनिवार्य-पाठ लेख देखें: 7) जागरूकता से परे: पहचान और जागरूकता पर चिंतन (Beyond Awareness: reflections on identity and awareness) https://www.awakeningtoreality.com/2018/11/beyond-awareness.html और 6) I AM, One Mind, No Mind और अनात्मा (Anatta) के भेद (Differentiating I AM, One Mind, No Mind and Anatta) https://www.awakeningtoreality.com/2018/10/differentiating-i-am-one-mind-no-mind.html

AtR मार्गदर्शिका के लंबे, असंक्षिप्त संस्करण से एक अंश:

Soh की टिप्पणी, 2021: “चरण 4 में व्यक्ति इस दृष्टि में फँस सकता है कि सब कुछ एक ही जागरूकता है जो विभिन्न रूपों में रूपान्तरित हो रही है—जैसे सोना अपने शुद्ध सोने-द्रव्य को कभी छोड़े बिना विभिन्न आभूषणों का आकार लेता है। यह ब्रह्मन्-दृष्टि है। ऐसी दृष्टि और अंतर्दृष्टि अद्वैत हो सकती है, पर वह अब भी सार-दृष्टि और ‘अंतर्निहित अस्तित्व’ के प्रतिमान पर आधारित है। इसके बजाय व्यक्ति को जागरूकता की शून्यता का बोध करना चाहिए—कि वह ‘मौसम’ की तरह केवल एक नाम है; मौसम-उपमा वाला अध्याय देखें—और चेतना को प्रतीत्यसमुत्पाद की दृष्टि से समझना चाहिए। यह अंतर्दृष्टि-स्वच्छता उस सार-दृष्टि को हटाती है जिसमें चेतना को कोई अंतर्निहित सार मान लिया जाता है जो यह और वह बनकर रूपान्तरित होता है। Walpola Rahula की पुस्तक ‘What the Buddha Taught’ इस विषय में दो महान बौद्ध शास्त्रीय शिक्षाएँ उद्धृत करती है:

यहाँ फिर दोहराना होगा कि बौद्ध दर्शन के अनुसार पदार्थ के विपरीत कोई स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा नहीं है जिसे स्व (Self), आत्मा (Soul) या अहं (Ego) माना जा सके, और चेतना (viññāṇa) को पदार्थ के विपरीत ‘आध्यात्मिक या चेतन द्रव्य’ नहीं समझना चाहिए। इस बिंदु पर विशेष बल देना आवश्यक है, क्योंकि यह गलत धारणा कि चेतना किसी प्रकार का स्व (Self) या आत्मा (Soul) है जो जीवन भर स्थायी द्रव्य की तरह चलता रहता है, प्राचीन समय से आज तक बनी रही है।

बुद्ध के अपने ही एक शिष्य, साती, ने माना कि गुरु ने यह सिखाया है: “यही वही चेतना है जो आवागमन करती और भटकती रहती है।” बुद्ध ने उससे पूछा कि वह “चेतना” से क्या समझता है। साती का उत्तर क्लासिक है: “वही जो व्यक्त करती है, महसूस करती है, और यहाँ-वहाँ शुभ-अशुभ कर्मों के फल अनुभव करती है।”

“अरे मूर्ख, तुमने मुझसे कब इस प्रकार धर्म का प्रतिपादन सुना?” गुरु ने उसे डाँटा। “क्या मैंने अनेक प्रकार से यह नहीं समझाया कि चेतना प्रत्ययों से उत्पन्न होती है—कि प्रत्ययों के बिना चेतना का उदय नहीं होता?” फिर बुद्ध ने चेतना को विस्तार से समझाया: “चेतना जिस-जिस प्रत्यय से उदित होती है, उसी के अनुसार उसका नाम होता है: नेत्र और दृश्य-रूपों के आधार पर चेतना उदित होती है और उसे दृश्य-चेतना कहा जाता है; कान और ध्वनियों के आधार पर चेतना उदित होती है और उसे श्रवण-चेतना कहा जाता है; नाक और गंधों के आधार पर चेतना उदित होती है और उसे घ्राण-चेतना कहा जाता है; जीभ और रसों के आधार पर चेतना उदित होती है और उसे रसना-चेतना कहा जाता है; शरीर और स्पर्शनीय वस्तुओं के आधार पर चेतना उदित होती है और उसे काय-चेतना कहा जाता है; मन और मन-विषयों—विचारों और धारणाओं—के आधार पर चेतना उदित होती है और उसे मनो-चेतना कहा जाता है।”

फिर बुद्ध ने इसे आग की उपमा से और स्पष्ट किया। आग जिस सामग्री के कारण जलती है उसी के अनुसार उसका नाम होता है। लकड़ी के कारण जलने वाली आग लकड़ी-अग्नि कहलाती है; घास-पुआल के कारण जलने वाली आग पुआल-अग्नि कहलाती है। इसी प्रकार चेतना भी जिस प्रत्यय से उदित होती है उसी के अनुसार नामित होती है।

महान भाष्यकार बुद्धघोष इस बिंदु पर समझाते हैं: “लकड़ी के कारण जलने वाली आग केवल तब तक जलती है जब तक आपूर्ति है; आपूर्ति समाप्त होते ही, प्रत्यय बदल जाने के कारण, वह वहीं शांत हो जाती है। वह कतरनों आदि में पार जाकर कतरन-अग्नि नहीं बन जाती। इसी प्रकार नेत्र और दृश्य-रूपों के आधार पर उदित चेतना केवल उसी इन्द्रिय-द्वार—नेत्र—में उदित होती है, जब नेत्र, दृश्य-रूप, प्रकाश और ध्यान का प्रत्यय उपस्थित हो; और जब प्रत्यय नहीं रहता तो वह वहीं शांत हो जाती है। वह कान आदि में पार जाकर श्रवण-चेतना नहीं बन जाती...”

बुद्ध ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चेतना रूप, वेदना, संज्ञा और संस्कारों पर निर्भर है, और उनसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्व नहीं रख सकती। वे कहते हैं:

“चेतना रूप को साधन, रूप को विषय और रूप को आधार बनाकर, आस्वाद खोजते हुए, बढ़ सकती है, बढ़ोतरी पा सकती है और विकसित हो सकती है; या चेतना वेदना को साधन... या संज्ञा को साधन... या संस्कारों को साधन, संस्कारों को विषय और संस्कारों को आधार बनाकर, आस्वाद खोजते हुए, बढ़ सकती है, बढ़ोतरी पा सकती है और विकसित हो सकती है।

“यदि कोई व्यक्ति कहे: मैं रूप, वेदना, संज्ञा और संस्कारों से अलग चेतना का आना, जाना, लय, उदय, वृद्धि, बढ़ोतरी या विकास दिखाऊँगा—तो वह ऐसी वस्तु की बात कर रहा होगा जो अस्तित्व में ही नहीं है।”

बोधिधर्म ने भी इसी प्रकार सिखाया: अंतर्दृष्टि से देखने पर रूप केवल रूप नहीं है, क्योंकि रूप मन पर निर्भर है। और मन केवल मन नहीं है, क्योंकि मन रूप पर निर्भर है। मन और रूप एक-दूसरे को रचते और निरस्त करते हैं। … मन और जगत विपरीत ध्रुव हैं; जहाँ वे मिलते हैं, वहाँ प्रकटताएँ उदित होती हैं। जब तुम्हारा मन भीतर नहीं हिलता, तब जगत बाहर उदित नहीं होता। जब जगत और मन दोनों पारदर्शी हो जाते हैं, यही सच्ची अंतर्दृष्टि है।” (Wakeup Discourse से) Awakening to Reality: बोधि का मार्ग (Awakening to Reality: Way of Bodhi) https://www.awakeningtoreality.com/2018/04/way-of-bodhi.html

Soh ने 2012 में लिखा:

25 फ़रवरी 2012

मैं Shikantaza—ज़ेन की “केवल बैठना” ध्यान-पद्धति—को साक्षात्कार और प्रबोधन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में देखता हूँ।

पर बहुत-से लोग इसे पूरी तरह गलत समझते हैं। वे सोचते हैं कि साधना-प्रबोधन (practice-enlightenment) का अर्थ है कि साक्षात्कार की आवश्यकता नहीं, क्योंकि साधना ही प्रबोधन है। दूसरे शब्दों में, ध्यान करते समय एक आरम्भिक साधक भी बुद्ध जितना साक्षात्कारी है।

यह बिल्कुल गलत है—मूर्खतापूर्ण सोच।

बल्कि समझो कि साधना-प्रबोधन साक्षात्कार की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है; और साक्षात्कार के बिना व्यक्ति साधना-प्रबोधन का सार नहीं खोज पाएगा।

जैसा मैंने अपने मित्र और शिक्षक Thusness से कहा: “पहले मैं लक्ष्य और दिशा लेकर बैठता था। अब बैठना स्वयं प्रबोधन है। बैठना बस बैठना है—बैठने की क्रिया ही है, एयर-कॉन की गूँज, श्वास। चलना स्वयं प्रबोधन है। साधना प्रबोधन पाने के लिए नहीं की जाती; बल्कि सारी क्रियाशीलता स्वयं प्रबोधन और बुद्ध-स्वभाव की पूर्ण अभिव्यक्ति है। जाने के लिए कहीं नहीं है।”

मुझे इसे सीधे अनुभव करने की कोई संभावना नहीं दिखती जब तक स्पष्ट, प्रत्यक्ष अद्वैत अंतर्दृष्टि न हो। इस तात्कालिक प्रकट-क्षण को स्वयं बुद्ध-स्वभाव के रूप में आदिम शुद्धता और स्वस्फूर्त पूर्णता में जाने बिना, हमेशा ‘करने’ का प्रयास रहेगा—कुछ पाने का प्रयास—चाहे वह सांसारिक शांति या समाधि की अवस्थाएँ हों, या अतीन्द्रिय जागरण अथवा मुक्ति की अवस्थाएँ। यह सब इस तात्कालिक क्षण के वास्तविक स्वभाव के अज्ञान के कारण ही है।

फिर भी अद्वैत अनुभव को अब भी इस प्रकार विभाजित किया जा सकता है:

1) One Mind

हाल में मैंने देखा है कि अधिकांश आध्यात्मिक शिक्षक और आचार्य अद्वैत को One Mind की दृष्टि से वर्णित करते हैं। अर्थात्, विषय-वस्तु अथवा ग्रहणकर्ता-ग्रह्य का विभाजन या द्विभेद नहीं है—यह जान लेने के बाद वे सब कुछ केवल चित्त-मात्र मान लेते हैं: पर्वत और नदियाँ सब “मैं” हैं—एक अविभाजित सार जो अनेक के रूप में प्रकट हो रहा है।

यद्यपि यह अलगावरहित है, फिर भी दृष्टि अब भी किसी अंतर्निहित आध्यात्मिक सार की है। इसलिए अद्वैत है, पर अंतर्निहित-सत्तात्मक है।

2) No Mind

जहाँ “एक निर्वरण जागरूकता” (One Naked Awareness), “One Mind” या कोई स्रोत (Source) भी पूरी तरह भुला और विलीन हो जाता है—सिर्फ दृश्य, ध्वनि, उदित विचार और गुज़रती गंध रह जाते हैं। केवल आत्म-प्रकाशमान क्षणभंगुरता का प्रवाह।

...

लेकिन हमें समझना होगा कि No Mind का अनुभव भी अभी अनात्मा (Anatta) का साक्षात्कार नहीं है। No Mind अवस्था में वह एक शिखर-अनुभव बना रह सकता है। वास्तव में One Mind के स्तर का साधक कभी-कभी No Mind के क्षेत्र में प्रवेश करता है; यह स्वाभाविक प्रगति है। पर क्योंकि दृष्टि के स्तर पर साक्षात्कार द्वारा कोई निर्णायक भेदन नहीं हुआ, स्रोत (Source) या One Mind की अवस्था की ओर लौट धँसने की सुप्त प्रवृत्ति बहुत प्रबल रहती है और No Mind का अनुभव स्थिर नहीं टिकता। साधक जागरूकता में निर्वरण और अविकल्प रहने के द्वारा No Mind के अनुभव को बनाए रखने का पूरा प्रयास कर सकता है, पर कोई निर्णायक भेदन तब तक नहीं आता जब तक कोई विशेष साक्षात्कार उदित न हो।

विशेष रूप से, इस अंतर्निहित स्व-दृष्टि को भेदने वाला आवश्यक साक्षात्कार यह है कि सदा से कोई स्व कभी था ही नहीं और अभी भी नहीं है—देखते समय हमेशा केवल देखा हुआ, दृश्य, आकार और रंग ही हैं, कभी कोई द्रष्टा नहीं! सुनते समय केवल श्रव्य स्वर हैं, कोई सुनने वाला नहीं! केवल क्रियाएँ हैं, कोई स्वतंत्र कर्ता नहीं! प्रतीत्यसमुत्पाद की प्रक्रिया स्वयं चलती और जानती है—उसमें कोई स्व, स्वतंत्र कर्ता, ग्रहणकर्ता या नियंत्रक नहीं।

यही साक्षात्कार “द्रष्टा-देखना-दृश्य” या “एक निर्वरण जागरूकता” (One Naked Awareness) की दृष्टि को स्थायी रूप से तोड़ता है, क्योंकि यह जानता है कि कभी कोई “एक जागरूकता” थी ही नहीं। “जागरूकता”, “देखना”, “सुनना”—ये सब केवल लगातार बदलती संवेदनाओं, दृश्यों और ध्वनियों के नाम हैं, जैसे “मौसम” शब्द किसी अपरिवर्तनीय सत्ता की ओर नहीं, बल्कि वर्षा, हवा, बादल आदि के क्षण-क्षण बनते-बिगड़ते प्रवाह की ओर संकेत करता है।

फिर जाँच और अंतर्दृष्टि गहरी होने पर देखा और अनुभव किया जाता है कि केवल प्रतीत्यसमुत्पाद की यही प्रक्रिया है—सभी कारण और प्रत्यय इस तात्कालिक क्रिया-क्षण में एकत्र—इसलिए सेब खाते समय मानो ब्रह्मांड सेब खा रहा है, ब्रह्मांड यह संदेश टाइप कर रहा है, ब्रह्मांड ध्वनि सुन रहा है… या ब्रह्मांड ही ध्वनि है। बस यही Shikantaza है। देखते समय केवल देखा हुआ; बैठते समय केवल बैठना; और पूरा ब्रह्मांड बैठ रहा है। जब कोई स्व नहीं, ध्यान से अलग कोई ध्यानकर्ता नहीं, तब यह अन्यथा हो ही नहीं सकता। हर क्षण साधना-प्रबोधन होने से बच नहीं सकता। यह एकाग्रता या किसी बनाए हुए प्रयास का परिणाम भी नहीं, बल्कि साक्षात्कार, अनुभव और दृष्टि की वास्तविक-समय में स्वाभाविक पुष्टि है।

ज़ेन गुरु Dogen, जो साधना-प्रबोधन के प्रतिपादक हैं, ज़ेन बौद्ध धर्म के उन दुर्लभ और उज्ज्वल रत्नों में से हैं जिनमें अनात्मा और प्रतीत्यसमुत्पाद की अत्यंत गहरी अनुभूतिगत स्पष्टता है। वास्तविक समय में अनात्मा और प्रतीत्यसमुत्पाद के गहरे साक्षात्कार-अनुभव के बिना हम कभी नहीं समझ सकते कि Dogen किस ओर संकेत कर रहे हैं। उनके शब्द रहस्यमय, गूढ़ या काव्यमय लग सकते हैं, पर वास्तव में वे बस इसी की ओर संकेत करते हैं।

किसी ने “शिकायत” की कि Shikantaza केवल क्लेशों का अस्थायी दमन है, उनका स्थायी उच्छेद नहीं। पर यदि कोई अनात्मा को साक्षात् करता है, तो स्व-दृष्टि का स्थायी अंत होता है, अर्थात् पारंपरिक स्रोतापत्ति: पारंपरिक स्रोतापत्ति (traditional stream-entry) ( https://www.reddit.com/r/streamentry/comments/igored/insight_buddhism_a_reconsideration_of_the_meaning/?utm_source=share&utm_medium=ios_app&utm_name=iossmf%20 )

.....

अभी हाल में Soh ने किसी को यह भी लिखा:

यह वास्तव में समझना बहुत सरल है। तुम “मौसम” शब्द जानते हो? वह अपने-आप में कोई वस्तु नहीं है, सही? वह बस बदलते हुए पैटर्नों—बादलों के बनने और छँटने, हवा के बहने, सूर्य के चमकने, वर्षा के गिरने, आदि—के लिए एक नाम है; लगातार बदलते, परस्पर-निर्भर उदित कारकों की अनगिनत समष्टि।

अब सही बात यह समझना है कि “जागरूकता” मौसम से अलग नहीं है। यह केवल देखा, सुना, अनुभूत सब कुछ के लिए एक शब्द है। सब कुछ शुद्ध उपस्थिति (Pure Presence) के रूप में स्वयं को प्रकट करता है; और हाँ, मृत्यु के समय निराकार स्पष्ट-प्रकाश उपस्थिति (clear light Presence), या यदि तुम उस पहलू की ओर ट्यून करो, तो वह भी बस एक और प्रकटता है, एक और इन्द्रिय-द्वार है, कोई अधिक विशेष नहीं। “जागरूकता” भी “मौसम” की तरह आश्रित नामकरण है—सिर्फ एक नामकरण, जिसका अपना कोई अंतर्निहित अस्तित्व नहीं।

गलत तरीका यह है कि “मौसम” को कोई अपने-आप में विद्यमान पात्र मान लिया जाए, जिसमें वर्षा और हवा आती-जाती हैं, पर “मौसम” किसी अपरिवर्तनीय पृष्ठभूमि की तरह वर्षा और हवा बनकर रूपान्तरित होता रहता है। यह शुद्ध भ्रम है; ऐसी कोई वस्तु नहीं। जाँच करने पर ऐसा “मौसम” केवल मानसिक रूप से गढ़ी हुई कल्पना है जिसका वास्तविक अस्तित्व नहीं। उसी प्रकार “जागरूकता” कोई ऐसी अपरिवर्तनीय वस्तु नहीं जो बनी रहती है और एक अवस्था से दूसरी अवस्था में रूपान्तरित होती है। वह “लकड़ी” की तरह नहीं जो “राख में बदलती” है। लकड़ी लकड़ी है, राख राख है।

Dogen ने कहा:

“जब तुम नाव में बैठकर किनारे को देखते हो, तुम्हें लग सकता है कि किनारा चल रहा है। पर जब तुम अपनी दृष्टि नाव पर टिकाते हो, तो देख सकते हो कि नाव चल रही है। इसी प्रकार यदि तुम भ्रमित शरीर-मन से असंख्य वस्तुओं की जाँच करते हो, तो तुम्हें लग सकता है कि तुम्हारा मन और प्रकृति स्थायी हैं। पर जब तुम निकटता से अभ्यास करते हो और जहाँ हो वहीं लौटते हो, तो स्पष्ट होगा कि किसी भी चीज़ में अपरिवर्तनीय स्व नहीं है।

लकड़ी राख बन जाती है और फिर लकड़ी नहीं बनती। फिर भी यह मत समझो कि राख भविष्य है और लकड़ी अतीत। समझना चाहिए कि लकड़ी लकड़ी की धर्म-अवस्था में स्थित है, जिसमें अतीत और भविष्य पूरी तरह शामिल हैं और जो अतीत-भविष्य से स्वतंत्र है। राख राख की धर्म-अवस्था में स्थित है, जिसमें भविष्य और अतीत पूरी तरह शामिल हैं। जैसे लकड़ी राख बनने के बाद फिर लकड़ी नहीं लौटती, वैसे ही मृत्यु के बाद तुम जन्म में वापस नहीं लौटते।”

(ध्यान रहे कि Dogen और बौद्ध पुनर्जन्म को अस्वीकार नहीं करते, पर पुनर्जन्म से गुज़रती किसी अपरिवर्तनीय आत्मा को नहीं मानते; देखें आत्मा के बिना पुनर्जन्म (Rebirth Without Soul) https://www.awakeningtoreality.com/2018/12/reincarnation-without-soul.html )

.....

Soh:

जब कोई समझता है कि जागरूकता और प्रकटता का संबंध किसी अंतर्निहित द्रव्य और उसकी प्रकटता का नहीं, बल्कि जल और गीलापन जैसा है (https://www.awakeningtoreality.com/2018/06/wetness-and-water.html), या “बिजली” और “चमक” जैसा है (https://www.awakeningtoreality.com/2013/01/marshland-flowers_17.html)—चमक से अलग कोई बिजली कभी थी ही नहीं, न चमक की कोई कर्ता-सत्ता; क्रियाओं को आरम्भ करने के लिए कोई स्वतंत्र कर्ता या संज्ञा आवश्यक नहीं, बस उसी घटना के लिए अलग शब्द हैं—तब व्यक्ति अनात्मा अंतर्दृष्टि में प्रवेश करता है।

सार-दृष्टि वाले लोग सोचते हैं कि कोई वस्तु दूसरी वस्तु में बदल रही है, जैसे सार्वभौमिक चेतना यह और वह बनकर बदल रही है। अनात्मा अंतर्दृष्टि अंतर्निहित-दृष्टि को भेदती है और केवल प्रतीत्यसमुत्पन्न धर्मों को देखती है; प्रत्येक क्षणिक उदाहरण अलग और विच्छिन्न है, यद्यपि अन्य सभी धर्मों के साथ परस्पर निर्भर है। यह कोई वस्तु दूसरी वस्तु में बदलने का मामला नहीं है।

......

Soh Wei Yu: Anurag Jain

Soh Wei Yu: प्रत्यक्ष पथ (Direct Path) में उदयमानों का समग्र विन्यास देखे जाने के बाद साक्षी (Witness) ढह जाता है। वस्तुओं को, जैसा तुमने कहा, पहले ही पूरी तरह विघटित किया जा चुका होना चाहिए। वस्तुओं और उदयमानों के विघटित हो जाने पर साक्षी रहने के लिए कुछ नहीं बचता, और वह ढह जाता है।

1 · 1m

John Tan: सच नहीं। वस्तु और उदय भी सर्वव्यापी जागरूकता में समाहित होकर ढह सकते हैं।

Soh Wei Yu: हाँ, पर वह अद्वैत जैसा है।

Soh Wei Yu: अर्थात साक्षी (Witness) और उदय के ढहने के बाद भी वह अद्वैत हो सकता है।

Soh Wei Yu: पर अभी भी One Mind।

Soh Wei Yu: ठीक?

Soh Wei Yu: लेकिन Atmananda ने भी कहा कि अंत में चेतना की धारणा भी विलीन हो जाती है।

Soh Wei Yu: मुझे लगता है यह One Mind से No Mind की ओर जैसा है, पर निश्चित नहीं कि यह अनात्मा (Anatta) की बात करता है या नहीं।

John Tan: हाँ।

Soh Wei Yu: Anurag Jain

Soh Wei Yu: “सर्व-समावेशी जागरूकता” की धारणा कहाँ है? ऐसा लगता है जैसे जागरूकता को एक पात्र के रूप में ठोस बना दिया गया है।

· 5m

Anurag Jain: Soh Wei Yu, जब आप कहते हैं कि चेतना विलीन हो जाती है, तो पहले यह उत्तर देना होगा कि वह पहली जगह अस्तित्व में आई ही कैसे? 🙂

Soh Wei Yu: समझ गया।

John Tan: अंतर्भाव में पात्र–अंतर्वस्तु का संबंध नहीं होता; केवल जागरूकता है।

Soh Wei Yu: Anurag Jain — तो Soh Wei Yu, जागरूकता कैसे “बनी रहती” है? कहाँ और कैसे?

John Tan: खैर, यह अनावश्यक बहस के लिए नहीं है। यदि वह सचमुच समझता है, तो बस रहने दो।

.....

“हाँ। विषय और वस्तु दोनों शुद्ध दर्शन में ढह सकते हैं, लेकिन जब यह शुद्ध दर्शन भी छूटकर क्षीण हो जाता है तभी स्वाभाविक स्वस्फूर्तता और प्रयासरहित सहजता अद्भुत ढंग से कार्य करना शुरू करती है। इसलिए यह पूरी तरह पैठा हुआ होना चाहिए; इसी कारण इतना ज़ोर दिया गया है। लेकिन मुझे लगता है वह समझता है, इसलिए तुम्हें लगातार टोका-टाकी करने की ज़रूरत नहीं 🤣।” — John Tan

Mipham Rinpoche ने मध्यमक, चित्तमात्र, और मैत्रेय तथा असंग का वास्तविक अभिप्राय (Madhyamaka, Cittamātra, and the true intent of Maitreya and Asaṅga) से उद्धृत अंशों में लिखा:

... तब Mādhyamika आचार्य Cittamātra सिद्धान्त-प्रणाली का खंडन क्यों करते हैं? क्योंकि Cittamātra मत के स्वघोषित समर्थक जब चित्त-मात्र की बात करते हैं, कहते हैं कि बाहरी वस्तुएँ नहीं हैं पर मन द्रव्य रूप से विद्यमान है—जैसे रस्सी साँपत्व से रहित है, पर रस्सित्व से रहित नहीं। वे यह समझने में असफल रहे कि ऐसे कथन पारंपरिक दृष्टि से कहे जाते हैं, इसलिए वे अद्वैत चेतना को परम स्तर पर सचमुच विद्यमान मान लेते हैं। इसी सिद्धान्त का Mādhyamika खंडन करते हैं। पर वे कहते हैं कि हम Ārya Asaṅga की समझ का खंडन नहीं करते, जिन्होंने बुद्ध द्वारा सिखाए चित्त-मात्र पथ को सही ढंग से जाना था...

... इसलिए यदि Cittamātrin द्वारा प्रतिपादित तथाकथित “स्व-प्रकाशमान अद्वैत चेतना” को ऐसी चेतना समझा जाए जो सभी द्वैत चेतनाओं की परम सत्ता है, और केवल उसका विषय और वस्तु अकथनीय है; और यदि ऐसी चेतना सचमुच विद्यमान और स्वभावतः रिक्त नहीं मानी जाए, तो उसका खंडन करना होगा। दूसरी ओर, यदि उस चेतना को आरम्भ से ही अजन्मा—अर्थात् रिक्त—समझा जाए, जिसे प्रत्यावर्त जागरूकता (reflexive awareness) द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है, और जो विषय-वस्तु रहित स्व-प्रकाशमान ज्ञान है, तो उसे स्थापित करना होगा। Madhyamaka और Mantrayāna दोनों को यह स्वीकार करना होगा...

......

ज्ञाता ज्ञेय को ग्रहण करता है;
ज्ञेय के बिना ज्ञान नहीं;
तो तुम क्यों नहीं मानते
कि वस्तु और विषय दोनों [बिल्कुल] नहीं हैं?

मन केवल एक नाम मात्र है;
अपने नाम से अलग उसका कोई अस्तित्व नहीं;
इसलिए चेतना को नाम मात्र जानो;
नाम का भी कोई अंतर्निहित स्वभाव नहीं।

भीतर हो या बाहर,
या दोनों के बीच कहीं,
जिनों ने मन को कभी नहीं पाया;
इसलिए मन मायिक स्वभाव का है।

रंगों और आकारों के भेद,
या वस्तु और विषय के भेद,
पुरुष, स्त्री और नपुंसक—
मन के ऐसे कोई निश्चित रूप नहीं।

संक्षेप में बुद्धों ने कभी नहीं देखा,
और न कभी देखेंगे [ऐसा मन];
जो अंतर्निहित स्वभाव से रहित है,
उसे वे अंतर्निहित स्वभाव कैसे देख सकते हैं?

“सत्ता” एक अवधारणात्मक निर्माण है;
अवधारणात्मक निर्माण का अभाव शून्यता है;
जहाँ अवधारणाकरण होता है,
वहाँ शून्यता कैसे हो सकती है?

ग्रह्य और ग्रहणकर्ता के रूप में मन—
तथागतों ने उसे कभी नहीं देखा;
जहाँ ग्रह्य और ग्रहणकर्ता है,
वहाँ प्रबोधन नहीं।

लक्षणों और उत्पत्ति से रहित,
द्रव्यात्मक यथार्थता से रहित और वाणी से परे,
आकाश, बोधिचित्त और प्रबोधन
अद्वैत के लक्षण रखते हैं।

— Nāgārjuna

....

साथ ही, हाल में मैंने Reddit पर कई लोगों को देखा है जो Thanissaro Bhikkhu की इस शिक्षा से प्रभावित हैं कि अनात्मा केवल अस्मिता-त्याग की रणनीति है, धर्म-मुद्रा में अंतर्दृष्टि के रूप में अनात्मा का साक्षात्कार (realizing anatta as an insight into a dharma seal) https://www.awakeningtoreality.com/2021/07/anatta-is-dharma-seal-or-truth-that-is.html के महत्व की शिक्षा नहीं। वे सोचते हैं कि अनात्मा केवल “यह स्व नहीं है” (not-self) है, न कि “कोई स्व नहीं” (no-self) और स्व (self) की शून्यता। ऐसी समझ गलत और भ्रामक है। मैंने 11 वर्ष पहले अपने लेख अनात्मा: Not-Self या No-Self? (Anatta: Not-Self or No-Self?) https://www.awakeningtoreality.com/2011/10/anatta-not-self-or-no-self_1.html में अनेक शास्त्रीय उद्धरणों के साथ इस पर लिखा था।

स्रोत लिंक: मूल Facebook चर्चा-स्रोत

9 अगस्त 2025

Sim Pern Chong: वे [Yang Ding Yi] जो कह रहे हैं, वह ठीक-ठीक I AM चरण ही है। जब मैं 27 वर्ष का था और मेरे भीतर निर्णायक I AM उपस्थिति थी, तब मैं भी इसी तरह बोलता। इस चरण में अद्वैत अभी समझा नहीं गया होता, यद्यपि वे विषय और वस्तु की बात करते हुए प्रतीत होते हैं। यदि पिछले जन्मों की स्मृति भी हो, तब भी पुनर्जन्म की गतिकी अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं होती, क्योंकि पुनर्जन्म का तंत्र “स्व” है। जब अनात्मा का साक्षात्कार होता है और पुनर्जन्म-संबद्धि के आलय-चरण को प्रत्यक्ष किया जा सकता है, तब पुनर्जन्म का तंत्र बहुत स्पष्ट हो जाता है। यही मेरा अनुभव था।

Soh Wei Yu: हाँ, बस I AM ही। मैंने पहले उनकी पुस्तकों को सरसरी तौर पर देखा है; वे केवल आत्म-विचार और I AM तक ही सीमित हैं।

William Lim: “बस”?

Soh Wei Yu: हाँ, क्योंकि हमें “मैं हूँ”-भाव (I AMness) को ज़रूरत से ज़्यादा महत्त्व देकर ऊँचा नहीं उठाना चाहिए। यह एक महत्त्वपूर्ण प्रारम्भिक साक्षात्कार है, पर यह हमें संसार से मुक्त नहीं करता।

14 अप्रैल 2007

Thusness: अनेक अद्वैत आचार्यों ने लोगों को “स्व” का अनुभव करने की सलाह दी है, पर मुक्ति का सार “स्व” का अनुभव करने में नहीं है। कोई “मैं हूँ”-भाव (I AMness)—अस्तित्व की शुद्ध अनुभूति—को लाख बार अनुभव कर ले, तब भी वह प्रबोधन के किसी भी पक्ष में सहायक नहीं होता, चाहे वह अनुभव कितना भी रहस्यमय और अतीन्द्रिय क्यों न हो।

Thusness: यदि ऐसा अनुभव हमारे द्वैतात्मक चिंतन को और पुष्ट कर दे, तो उससे और भी अधिक हानि होती है। वास्तव में, यह गलत निष्कर्ष कि जागरूकता एक अपरिवर्तनीय, स्थायी सत्ता है, एक अद्वैत अनुभव के विकृत हो जाने का परिणाम है—क्योंकि हमारा मन अपनी जड़ जमाई हुई द्वैतात्मक सोच की यांत्रिकी से परे नहीं जा पाता। जब द्वैतात्मक मन इस अनुभव को समझने की कोशिश करता है, तो वह इस “स्व” को पृष्ठभूमि के रूप में प्रक्षेपित कर देता है, ताकि अद्वैत अनुभव को अपने द्वैतात्मक ढाँचे में फिट कर सके। ऐसा अनुभव मुक्ति तक नहीं ले जा सकता, क्योंकि वह स्वभावतः द्वैतात्मक है। किसी भी प्रकार का विभाजन अमुक्तिदायक है।

Thusness: इसलिए बल जागरूकता के “नैरात्म्य” पक्ष पर सही ढंग से दिया जाना चाहिए। जागरूकता स्वभावतः अद्वैत है। अद्वैत होने के कारण वह अनित्य है, और निरंतर, अविराम तथा स्वस्फूर्त रूप से “समस्त” के रूप में प्रकट होती रहती है। यही वह स्पष्टता है जो प्रत्यक्ष अनुभव से आनी चाहिए। हमारे इस निर्मल स्वभाव के इन पहलुओं के बारे में कोई समझौता नहीं हो सकता। जागरूकता की आत्म-मुक्तिदायक प्रकृति का अनुभव करने के लिए यह पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए।

Soh Wei Yu: जनवरी 2005 में John Tan ने लिखा था:

<^john^> शून्यता और नैरात्म्य का अनुभव करना सीखो। मुक्त होने का यही एकमात्र मार्ग है। शुद्ध जागरूकता (Pure Awareness) के अपेक्षाकृत गौण पक्ष में बहुत गहराई तक मत अटको। हाल में मैं शुद्ध जागरूकता (Pure Awareness) के प्रकाशमान पक्ष से संबंधित गीत और कविताएँ देख रहा हूँ—अजन्मा, मूल, दर्पण-दीप्त, निर्वाण और संसार में कभी न खोने वाला, आदि। इन सबका क्या उपयोग है?

<ZeN`n1th> समझ गया..

<^john^> हम आदिकाल से ऐसे ही रहे हैं, फिर भी असंख्य कल्पों के जीवनों तक खोए रहे। बुद्ध केवल शुद्ध जागरूकता (Pure Awareness) के प्रकाशमान पक्ष की बात बताने नहीं आए थे। यह तो वेदों में भी कहा जा चुका है, पर वहाँ वह “स्व” बन जाता है—अंतिम नियन्ता, अमर, परम, आदि। यही समस्या है। यह शुद्ध जागरूकता (Pure Awareness) की अंतिम प्रकृति नहीं है। पूर्ण प्रबोधन के लिए स्पष्टता और शून्यता का अनुभव करो। बस इतना ही।


-------------- अद्यतन: 15/9/2009

‘स्रोत’ पर बुद्ध

Thanissaro Bhikkhu ने Mūlapariyāya Sutta: The Root Sequence पर अपनी टिप्पणी में कहा — https://www.dhammatalks.org/suttas/MN/MN1.html:

हालाँकि आज हम सामान्यतः सांख्य दार्शनिकों जैसी भाषा में नहीं सोचते, पर लंबे समय से—और आज भी—एक “बौद्ध” अध्यात्ममीमांसा गढ़ने की प्रवृत्ति रही है जिसमें शून्यता, असंस्कृत, धर्मकाय, बुद्ध-स्वभाव, rigpa आदि के अनुभव को अस्तित्व का आधार बताया जाता है, जिससे “समग्र”—हमारे इन्द्रिय और मानसिक अनुभव की संपूर्णता—उदित होता है और जिसमें हम ध्यान में लौटते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि ये सिद्धांत सीधे ध्यान-अनुभव के बिना विद्वानों की रचनाएँ हैं, पर वास्तव में वे अधिकतर ध्यानकर्ताओं से ही उत्पन्न हुए हैं, जो किसी विशेष ध्यान-अनुभव को अंतिम लक्ष्य का नाम देते हैं, उससे सूक्ष्म रूप में तादात्म्य कर लेते हैं—जैसे जब हमें कहा जाता है “हम जानना ही हैं”—और फिर उस अनुभव-स्तर को अस्तित्व का आधार मान लेते हैं जिससे अन्य सभी अनुभव आते हैं।

इन रेखाओं पर चलने वाली कोई भी शिक्षा उसी आलोचना के अधीन होगी जो बुद्ध ने इस प्रवचन को पहली बार सुनने वाले भिक्षुओं के प्रति निर्देशित की थी।

Rob Burbea ने उसी सुत्त पर मन के स्वभाव का साक्षात्कार (Realizing the Nature of Mind) में कहा:

एक बार बुद्ध ने भिक्षुओं के एक समूह से मूलतः कहा कि जागरूकता को सभी चीज़ों के स्रोत के रूप में न देखें। यानी यह भाव कि कोई विशाल जागरूकता है और सब कुछ उसमें से प्रकट होकर फिर उसमें लौट जाता है—जितना भी सुंदर हो—उन्होंने कहा कि वास्तविकता को देखने का यह कुशल तरीका नहीं है। वह बहुत रोचक सुत्त है, क्योंकि वह उन थोड़े से सुत्तों में है जिनके अंत में यह नहीं कहा गया कि भिक्षु बुद्ध के वचनों से आनंदित हुए।

वे भिक्षु यह सुनना नहीं चाहते थे। वे उस अंतर्दृष्टि-स्तर से काफी प्रसन्न थे, चाहे वह कितना भी सुंदर था; और कहा गया कि भिक्षु बुद्ध के वचनों में आनंदित नहीं हुए। (हँसी) और इसी तरह, शिक्षक के रूप में व्यक्ति इससे टकराता है। यह स्तर इतना आकर्षक है, इसमें किसी परम वस्तु का स्वाद इतना अधिक होता है, कि अक्सर लोग वहाँ से हिलते ही नहीं।

-------------- अद्यतन: 21/7/2008

क्या जागरूकता (Awareness) स्व (Self) है या केंद्र (Center)?

जागरूकता को आमने-सामने अनुभव करने का पहला चरण गोले पर किसी बिंदु जैसा है जिसे तुम केंद्र कहते हो। तुमने उसे चिह्नित कर दिया।

फिर बाद में तुमने जाना कि जब गोले की सतह पर अन्य बिंदुओं को चिह्नित करते हो, उनमें भी वही विशेषताएँ हैं। यह अद्वैत का प्रारम्भिक अनुभव है। (पर हमारी द्वैतवादी जड़ता के कारण, अद्वैत अनुभव होने पर भी स्पष्टता नहीं होती।)


Ken Wilber: जब आप उस अवस्था—साक्षी (Witness) अवस्था—में विश्राम कर रहे होते हैं और इस साक्षी (Witness) को एक विशाल विस्तार के रूप में “महसूस” कर रहे होते हैं, तब यदि आप, मान लें, किसी पर्वत को देखें, तो आप यह देखना शुरू कर सकते हैं कि साक्षी (Witness) की अनुभूति और पर्वत की अनुभूति वही एक अनुभूति हैं। जब आप अपने शुद्ध स्व (Self) को “महसूस” करते हैं और पर्वत को “महसूस” करते हैं, तो वे बिल्कुल वही एक अनुभूति हैं।

जब तुम्हें गोले की सतह पर दूसरा बिंदु खोजने को कहा जाता है, तुम निश्चित नहीं होते, पर अब भी बहुत सावधान रहते हो।

अनात्मा/नैरात्म्य (No-Self) की अंतर्दृष्टि स्थिर हो जाने पर तुम स्वतंत्र रूप से गोले की सतह के किसी भी बिंदु की ओर संकेत कर सकते हो—सभी बिंदु केंद्र हैं, इसलिए “वह केंद्र” नहीं है। “वह” केंद्र अस्तित्व में नहीं; सभी बिंदु केंद्र हैं।

जब तुम “वह केंद्र” कहते हो, तो एक बिंदु को चिह्नित कर दावा करते हो कि केवल उसी में “केंद्र” की विशेषता है। शुद्ध होने-बोध की तीव्रता स्वयं एक प्रकटता है। भीतर और बाहर में विभाजन अनावश्यक है, क्योंकि ऐसा बिंदु भी आएगा जहाँ सभी संवेदनाओं में स्पष्टता की उच्च तीव्रता अनुभव होगी। इसलिए “तीव्रता” को भीतर-बाहर की परत न बनाने दो।

जब हमें यह नहीं पता कि गोला क्या है, तब नहीं पता कि सभी बिंदु समान हैं। इसलिए जब कोई व्यक्ति अभी भी प्रवृत्तियों के सक्रिय रहते हुए पहली बार अद्वैत अनुभव करता है, हम मन-शरीर-विलय को पूरी तरह अनुभव नहीं कर पाते और अनुभव स्पष्ट नहीं होता। फिर भी हम अपने अनुभव के प्रति सावधान रहते हैं और अद्वैत होने का प्रयास करते हैं।

पर जब साक्षात्कार स्पष्ट हो जाता है और हमारी अंतरतम चेतना में गहराई तक उतर जाता है, तब यह सचमुच अप्रयास हो जाता है। इसलिए नहीं कि यह दिनचर्या है, बल्कि इसलिए कि करने को कुछ शेष नहीं—केवल चेतना के विस्तार को स्वाभाविक रूप से रहने देना।

अद्यतन, 2025, Soh द्वारा:

ज़ेन गुरु Dogen अपरिवर्तनीय ब्रह्मन् को नहीं मानते। बौद्ध शिक्षक होने के नाते वे अपरिवर्तनीय आत्मन्-ब्रह्मन् का खंडन करते हैं:

मेरे मार्गदर्शक Thusness/John Tan ने 2007 में ज़ेन गुरु Dogen के बारे में कहा: “Dogen महान ज़ेन गुरु हैं जिन्होंने अनात्मन् (Anatman) के अत्यंत गहरे स्तर में प्रवेश किया है।” “Dogen को पढ़ो… वे सचमुच महान ज़ेन गुरु हैं… [Dogen] उन बहुत थोड़े ज़ेन गुरुओं में हैं जो सचमुच जानते हैं।” “जब भी हम बुद्ध की सबसे बुनियादी शिक्षाएँ पढ़ते हैं, वे अत्यंत गहन होती हैं। कभी मत कहना कि हम उन्हें समझते हैं। विशेषकर जब बात प्रतीत्यसमुत्पाद की हो, जो बौद्ध धर्म का सबसे गहन सत्य है। कभी मत कहना कि हम इसे समझ चुके या अनुभव कर चुके हैं। अद्वैत अनुभव के कुछ वर्षों बाद भी हम इसे नहीं समझ सकते। इसके सबसे निकट आने वाले महान ज़ेन गुरु Dogen हैं, जो कालिकता को बुद्ध-स्वभाव के रूप में देखते हैं, क्षणभंगुरों को धर्म के जीवित सत्य और बुद्ध-स्वभाव की पूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं।”

“जब तुम नाव में बैठकर किनारे को देखते हो, तुम्हें लग सकता है कि किनारा चल रहा है। पर जब तुम अपनी दृष्टि नाव पर टिकाते हो, तो देख सकते हो कि नाव चल रही है। उसी प्रकार यदि तुम भ्रमित मन से अनेक वस्तुओं की जाँच करो, तुम्हें लग सकता है कि तुम्हारा मन और प्रकृति स्थायी हैं। पर जब तुम निकटता से अभ्यास करते और जहाँ हो वहाँ लौटते हो, तो स्पष्ट होगा कि ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें अपरिवर्तनीय स्व हो।”

• Dogen

“मन पर्वतों, नदियों और पृथ्वी के रूप में है—यह पर्वतों, नदियों और पृथ्वी से भिन्न नहीं। कोई अतिरिक्त तरंग या झाग, हवा या धुआँ नहीं। मन सूर्य, चन्द्र और तारों के रूप में है—यह सूर्य, चन्द्र और तारों से भिन्न नहीं।”

• Dogen

“Dōgen के लिए बुद्ध-स्वभाव या busshō (佛性) समस्त यथार्थ है, ‘सभी वस्तुएँ’ (悉有)। Shōbōgenzō में Dōgen लिखते हैं कि ‘समग्र-अस्तित्व ही बुद्ध-स्वभाव है’ और निर्जीव वस्तुएँ—चट्टानें, रेत, जल—भी बुद्ध-स्वभाव की अभिव्यक्ति हैं। उन्होंने बुद्ध-स्वभाव को स्थायी, द्रव्यात्मक आंतरिक स्व या आधार मानने वाली किसी भी दृष्टि को अस्वीकार किया। Dōgen बुद्ध-स्वभाव को ‘विशाल शून्यता’, ‘भव या बनने का जगत’ कहते हैं और लिखते हैं कि ‘अनित्यता स्वयं बुद्ध-स्वभाव है’। Dōgen के अनुसार: घास-पेड़, झाड़-वन की अनित्यता ही बुद्ध-स्वभाव है। मनुष्यों और वस्तुओं, शरीर और मन की अनित्यता ही बुद्ध-स्वभाव है। प्रकृति और भूमि, पर्वत और नदियाँ अनित्य हैं क्योंकि वे बुद्ध-स्वभाव हैं। सर्वोच्च और पूर्ण प्रबोधन, क्योंकि अनित्य है, बुद्ध-स्वभाव है। Takashi James Kodera लिखते हैं कि Dōgen की बुद्ध-स्वभाव-समझ का मुख्य स्रोत Nirvana Sutra का एक अंश है, जिसे सामान्यतः यह कहते हुए समझा जाता था कि सभी सत्त्वों में बुद्ध-स्वभाव है। पर Dōgen ने उसे भिन्न रूप से समझा: सभी सत्त्व, सभी वस्तुएँ, बुद्ध-स्वभाव हैं; तथागत स्थिर रहता है, अस्तित्वहीन भी है और अस्तित्वमान भी, तथा परिवर्तन है। Kodera के अनुसार, परम्परागत पठन में बुद्ध-स्वभाव सभी सत्त्वों में निहित स्थायी सार है; पर Dōgen कहते हैं कि सभी वस्तुएँ बुद्ध-स्वभाव हैं। पहले पठन में बुद्ध-स्वभाव अपरिवर्तनीय संभावना है; दूसरे में वह संसार की सभी वस्तुओं की सतत उदित और लयमान वास्तविकता है। इसलिए Dōgen के लिए बुद्ध-स्वभाव सब कुछ, ‘सभी वस्तुओं’ की पूर्णता, यहाँ तक कि घास, वृक्ष और भूमि जैसी निर्जीव वस्तुएँ भी शामिल करता है।” — https://en.wikipedia.org/wiki/Dōgen#Buddha-nature

John Tan ने वर्षों पहले लिखा:

“तुम और Andre स्थायित्व और अनित्यता की दार्शनिक अवधारणाओं पर बात कर रहे हो। Dogen उसकी बात नहीं कर रहे। Dogen का ‘अनित्यता बुद्ध-स्वभाव है’ कहना यह बताता है कि बुद्ध-स्वभाव को इन्हीं क्षणभंगुर प्रपंचों—पर्वतों, वृक्षों, सूर्यप्रकाश, पदचापों के ढोलक-स्वर—में सीधे प्रमाणित करो, किसी कल्पनालोक की अतिविशिष्ट जागरूकता में नहीं।”

http://books.google.com.sg/books?id=H6A674nlkVEC&pg=PA21&lpg=PA21

ज़ेन गुरु Dogen की Bendowa से

प्रश्न दस:

कुछ लोगों ने कहा है: जन्म-मरण की चिंता मत करो। जन्म-मरण से शीघ्र मुक्त होने का एक मार्ग है। वह है ‘चित्त-स्वभाव (mind-nature)’ की शाश्वत अपरिवर्तनशीलता का कारण पकड़ना। उसका सार यह है: शरीर जन्म लेने पर अवश्य मृत्यु की ओर जाता है, पर चित्त-स्वभाव कभी नष्ट नहीं होती। जब तुम समझ लो कि जन्म-मरण में प्रवास न करने वाली चित्त-स्वभाव तुम्हारे अपने शरीर में विद्यमान है, तो तुम उसे अपना मूल स्वभाव बना लेते हो। इसलिए शरीर केवल अस्थायी रूप है—यहाँ मरता है और वहाँ अनंत रूप से जन्म लेता है—पर मन अतीत, वर्तमान और भविष्य में अपरिवर्तनीय रहता है। इसे जानना जन्म-मरण से मुक्त होना है। इस सत्य को जानकर तुम उस आवागमन-चक्र का अंतिम अंत कर देते हो जिसमें घूमते रहे हो। शरीर मरने पर तुम मूल प्रकृति के महासागर में प्रवेश करते हो। उस महासागर में अपने मूल में लौटने पर तुम बुद्ध-पितृपुरुषों के अद्भुत गुण से सम्पन्न हो जाते हो। पर यदि वर्तमान जीवन में भी इसे पकड़ लो, तब भी क्योंकि तुम्हारा वर्तमान शरीर पूर्वजन्मों के भ्रांत कर्मों को धारण करता है, तुम ऋषियों के समान नहीं हो।

“जो इस सत्य को नहीं पकड़ते, वे जन्म-मरण के चक्र में सदा घूमने को नियत हैं। इसलिए आवश्यक है कि चित्त-स्वभाव की अपरिवर्तनशीलता का अर्थ विलंब किए बिना जानो। उद्देश्यहीन बैठने में पूरी जिंदगी गँवाकर तुम क्या पाओगे?”

तुम इस कथन के बारे में क्या सोचते हो? क्या यह बुद्धों और पितृपुरुषों के मार्ग से मूलतः संगत है?

उत्तर 10:

तुमने अभी Senika विधर्म का मत प्रतिपादित किया है। यह निश्चित ही बुद्ध-धर्म नहीं है।

इस विधर्म के अनुसार शरीर में एक आध्यात्मिक बुद्धि है। अवसरों के अनुसार यह बुद्धि सहज ही पसंद-नापसंद, हित-अहित का भेद करती है, पीड़ा और चिड़चिड़ाहट महसूस करती है, और दुःख-सुख अनुभव करती है—यह सब उसी आध्यात्मिक बुद्धि के कारण है। पर शरीर नष्ट होने पर यह आध्यात्मिक बुद्धि शरीर से अलग होकर किसी अन्य स्थान में जन्म लेती है। यद्यपि यहाँ नष्ट होती प्रतीत होती है, वहाँ जीवन रखती है; इसलिए वह अपरिवर्तनीय और अविनाशी है। यही Senika विधर्म का दृष्टिकोण है।

पर इस मत को सीखकर उसे बुद्ध-धर्म बताने की कोशिश करना टूटे हुए छप्पर की खपरैल को सोने का रत्न मानकर पकड़ने से भी अधिक मूर्खता है। ऐसी मूर्ख, दयनीय भ्रांति की तुलना नहीं। तांग वंश के Hui-chung ने इसके विरुद्ध तीव्र चेतावनी दी। क्या यह निरर्थक नहीं कि यह मिथ्या दृष्टि—मन टिकता है और रूप नष्ट होता है—बुद्धों के अद्भुत धर्म के बराबर ठहराई जाए; और जन्म-मरण का मूल कारण बनाते हुए यह सोचा जाए कि तुम जन्म-मरण से मुक्त हो? कितना शोचनीय! इसे मिथ्या, अबौद्ध दृष्टि जानो और इस पर कान मत दो।

विषय की प्रकृति और करुणा की भावना मुझे विवश करती है कि तुम्हें इस मिथ्या दृष्टि से छुड़ाने का प्रयास करूँ। तुम्हें जानना चाहिए कि बुद्ध-धर्म स्वाभाविक रूप से सिखाता है कि शरीर और मन एक ही हैं, सार और रूप दो नहीं। यह भारत और चीन दोनों में समझा गया है, इसलिए इसमें संदेह नहीं। क्या यह जोड़ना आवश्यक है कि बौद्ध अपरिवर्तनशीलता की शिक्षा सभी वस्तुओं को अपरिवर्तनशील कहती है, शरीर और मन में भेद किए बिना; और बौद्ध परिवर्तनशीलता की शिक्षा सभी वस्तुओं को परिवर्तनशील कहती है, सार और रूप में भेद किए बिना। इस दृष्टि से कोई कैसे कह सकता है कि शरीर नष्ट होता है और मन बना रहता है? यह सच्चे धर्म के विपरीत होगा।

इसके आगे, तुम्हें यह भी पूर्णतः जानना होगा कि जन्म-मरण स्वयं निर्वाण है। बौद्ध धर्म कभी जन्म-मरण से अलग निर्वाण की बात नहीं करता। वास्तव में, जब कोई सोचता है कि शरीर से अलग मन अपरिवर्तनीय है, तो वह न केवल उसे जन्म-मरण से मुक्त बुद्ध-प्रज्ञा समझने की भूल करता है, बल्कि वही मन जो ऐसा भेद करता है, अपरिवर्तनीय नहीं—वह उसी क्षण जन्म-मरण में घूम रहा है। क्या यह निराशाजनक स्थिति नहीं?

इस पर गहराई से विचार करो: बुद्ध-धर्म ने सदैव शरीर और मन की एकता को बनाए रखा है; यदि शरीर जन्मता और नष्ट होता है, तो शरीर से अलग मन अकेला जन्मता और मरता क्यों नहीं? यदि कभी शरीर और मन एक हों और कभी नहीं, तो बुद्ध की शिक्षा खोखली और असत्य हो जाएगी। और यह सोचकर कि जन्म-मरण कोई ऐसी वस्तु है जिससे हमें मुड़ जाना चाहिए, तुम बुद्ध-धर्म को ही अस्वीकार करने की भूल करते हो। ऐसी सोच से सावधान रहो।

समझो कि बौद्धों की चित्त-स्वभाव की शिक्षा, वह महान और सार्वभौमिक आयाम जो सभी प्रपंचों को समेटता है, पूरे ब्रह्मांड को समाहित करती है; सार और रूप में भेद नहीं करती, न जन्म या मृत्यु में उलझती है। प्रबोधन और निर्वाण सहित ऐसा कुछ नहीं जो चित्त-स्वभाव न हो। सभी धर्म—ब्रह्मांड के “घने और निकट असंख्य रूप”—एक-चित्त (One Mind) के रूप में समान हैं। सभी बिना अपवाद शामिल हैं। वे सभी धर्म, जो मार्ग के “द्वार” या प्रवेश हैं, उसी एक-चित्त (One Mind) के समान हैं। जब कोई बौद्ध प्रचार करता है कि इन धर्म-द्वारों में कोई भिन्नता नहीं, तो यह बताता है कि वह चित्त-स्वभाव को समझता है।

इस एक धर्म [One Mind] में शरीर और मन का भेद, जन्म-मरण और निर्वाण का अलगाव कैसे हो सकता है? हम सब मूलतः बुद्ध की संतान हैं; हमें अबौद्ध मत बकने वाले पागलों की बात नहीं सुननी चाहिए।

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2022: प्रतीत्यसमुत्पाद और शून्यता पर एक और विस्तार -
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तत्त्व और प्रपंच (Noumenon and Phenomenon)

ज़ेन गुरु Sheng Yen:

जब आप दूसरे चरण में होते हैं, तब यद्यपि आपको लगता है कि “मैं” का अस्तित्व नहीं है, फिर भी ब्रह्मांड का मूल तत्त्व (basic substance), या परम सत्य (Supreme Truth), अब भी विद्यमान प्रतीत होता है। यद्यपि आप पहचानते हैं कि सभी भिन्न-भिन्न प्रपंच इसी मूल तत्त्व (basic substance) या परम सत्य (Supreme Truth) का विस्तार हैं, फिर भी मूल तत्त्व और बाह्य प्रपंचों के बीच विरोध बना रहता है।
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जो व्यक्ति चान (ज़ेन) में प्रवेश कर चुका है, वह मूल तत्त्व और प्रपंचों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ी दो अलग चीज़ों के रूप में नहीं देखता। उन्हें हाथ की पीठ और हथेली की तरह भी नहीं दिखाया जा सकता। इसका कारण यह है कि प्रपंच स्वयं वही मूल तत्त्व हैं, और प्रपंचों से अलग कोई मूल तत्त्व नहीं मिलता। मूल तत्त्व की वास्तविकता ठीक उन्हीं प्रपंचों की अवास्तविकता में विद्यमान है, जो निरंतर बदलते रहते हैं और जिनका कोई स्थिर रूप नहीं होता। यही सत्य (Truth) है।


------------------अपडेट: 2/9/2008

sgForums से Thusness/Passerby का अंश:


AEN ने एक बहुत बढ़िया साइट पोस्ट की है, जो वही बताती है जिसे मैं समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। वीडियो ज़रूर देखो। चित्रण की सुविधा के लिए मैं वीडियो में चर्चा की गई बातों को विधि, दृष्टि और अनुभव के रूप में इस प्रकार बाँटूँगा:
1. विधि वह है जिसे सामान्यतः आत्म-विचार कहा जाता है।
2. वर्तमान में हमारी दृष्टि द्वैतात्मक है। हम चीज़ों को विषय-वस्तु विभाजन के रूप में देखते हैं।
3. अनुभव को आगे निम्न प्रकार से बाँटा जा सकता है:
3.1 पहचान की एक मज़बूत व्यक्तिगत अनुभूति।
3.2 अवधारणाओं से मुक्त एक महासागरीय अनुभव।
यह इसलिए होता है क्योंकि साधक स्वयं को अवधारणाओं, लेबलों और प्रतीकों से मुक्त करता है। मन लगातार सभी लेबलों और प्रतीकों से स्वयं को असंबद्ध करता रहता है।
3.3 ऐसा महासागरीय अनुभव जो हर चीज़ में विलीन हो जाता है।
अवधारणाहीनता की अवधि लंबी हो जाती है — इतनी लंबी कि मन-शरीर के ‘प्रतीकात्मक’ बंधन का विलय होने लगता है, और इस प्रकार भीतर-बाहर का विभाजन अस्थायी रूप से निलंबित हो जाता है।
3.2 और 3.3 के अनुभव अतीन्द्रिय हैं और बहुमूल्य भी। लेकिन इन अनुभवों की अक्सर गलत व्याख्या की जाती है और इन्हें किसी ऐसी सत्ता में वस्तुरूप दे दिया जाता है जो “परम, अपरिवर्तनीय और स्वतंत्र” हो। वीडियो का वक्ता इस वस्तुरूपित अनुभव को आत्मन् (Atman), ईश्वर (God) या बुद्ध-स्वभाव (Buddha Nature) कहता है। अवधारणाहीनता की तीव्रता की अलग-अलग डिग्रियों के अनुसार इसे “I AM” का अनुभव भी कहा जाता है। साधारणतः जिन्होंने 3.2 और 3.3 का अनुभव किया है, उनके लिए अनात्मा और शून्यता के सिद्धांत को स्वीकारना कठिन होता है। वे अनुभव इतने स्पष्ट, इतने वास्तविक और इतने आनंदमय होते हैं कि उन्हें छोड़ना कठिन लगता है। वे उनसे अभिभूत हो जाते हैं।

आगे बढ़ने से पहले, तुम क्यों सोचते हो कि ये अनुभव विकृत हो जाते हैं?

(संकेत: वर्तमान में हमारी दृष्टि द्वैतात्मक है। हम चीज़ों को विषय-वस्तु विभाजन के रूप में देखते हैं।)

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ध्यानजन्य आनन्द, हर्ष और उल्लास के विभिन्न प्रकार होते हैं।

शमथ ध्यान की तरह, प्रत्येक झान-अवस्था एकाग्रता के किसी निश्चित स्तर से जुड़े आनन्द का एक चरण दर्शाती है; हमारी प्रकृति की अंतर्दृष्टि से अनुभव किया गया आनन्द इससे भिन्न होता है।

द्वैतात्मक मन द्वारा अनुभव किया जाने वाला सुख और प्रसन्नता, साधक द्वारा अनुभव किए जाने वाले सुख से भिन्न होते हैं। “मैं हूँ”-भाव (I AMness) लगातार बकबक करने वाले द्वैतात्मक मन की तुलना में आनन्द का एक उच्चतर रूप है। यह ‘अतीन्द्रियता’ की एक अवस्था से जुड़ा आनन्द है — ऐसा आनन्द जो “रूपहीनता, गंधहीनता, रंगहीनता, गुणरहितता और विचाररहितता” के अनुभव से उत्पन्न होता है।


2021 का अपडेट: और उद्धरण

Thusness, 2009:

“...तत्काल और सहज-बोधपूर्ण प्रकाश का वह क्षण, जब तुम किसी ऐसी बात को समझते हो जो असंदिग्ध और अडिग है — इतनी शक्तिशाली दृढ़ता कि कोई भी, यहाँ तक कि बुद्ध भी, तुम्हें इस साक्षात्कार से डिगा न सके, क्योंकि साधक उसकी सत्यता को इतना स्पष्ट देखता है। यह ‘तुम’ की प्रत्यक्ष और अडिग अंतर्दृष्टि है। ज़ेन सतोरी को साकार करने के लिए साधक में यही साक्षात्कार होना चाहिए। तब तुम स्पष्ट समझोगे कि साधकों के लिए इस ‘“मैं हूँ”-भाव’ (I AMness) को छोड़ना और अनात्मा के सिद्धांत को स्वीकार करना इतना कठिन क्यों है। वास्तव में इस ‘साक्षी’ का कोई परित्याग नहीं है; बल्कि अंतर्दृष्टि गहरी होती है ताकि उसमें हमारी प्रकाशमान प्रकृति की अद्वैतता, आधारहीनता और परस्पर-संबद्धता भी सम्मिलित हो सके। जैसा Rob ने कहा, ‘अनुभव को बनाए रखो, लेकिन दृष्टि को परिष्कृत करो।’”

विभिन्न दृष्टिकोणों से बोध, अनुभव और अद्वैत अनुभव (Realization and Experience and Non-Dual Experience from Different Perspectives)
https://www.awakeningtoreality.com/2009/09/realization-and-experience-and-non-dual.html

I AM, One Mind, No Mind और अनात्मा (Anatta) के भेद (Differentiating I AM, One Mind, No Mind and Anatta)
https://www.awakeningtoreality.com/2018/10/differentiating-i-am-one-mind-no-mind.html

“‘स्व’ की भावना को सभी प्रवेश और निर्गमन बिंदुओं पर विलीन होना चाहिए। विलयन के प्रथम चरण में ‘स्व’ का विलय केवल मनो-क्षेत्र से संबंधित होता है। प्रवेश मन-स्तर पर होता है। अनुभव ‘हूँ-भाव’ (AMness) का होता है। ऐसा अनुभव होने पर साधक उस अतीन्द्रिय अनुभव से अभिभूत होकर उससे आसक्त हो सकता है और उसे चेतना की सबसे शुद्ध अवस्था समझ बैठता है, यह जाने बिना कि वह केवल मनो-क्षेत्र से संबंधित ‘अनात्मता’ (no-self) की अवस्था है।”

– John Tan, दशक से भी अधिक पहले

17 जुलाई 2021 का अपडेट: और उद्धरण

क्षणभंगुरता से अलग किया गया परम वही है जिसे मैंने theprisonergreco को अपनी दो पोस्टों में “पृष्ठभूमि” के रूप में इंगित किया था।

84. RE: क्या कोई परम वास्तविकता है? [Skarda 4 of 4]

27 मार्च 2009

हाय theprisonergreco,

पहला प्रश्न यह है कि यह तथाकथित “पृष्ठभूमि” वास्तव में क्या है? वास्तव में यह अस्तित्व में ही नहीं है। यह केवल एक अद्वैत अनुभव की ऐसी छवि है जो पहले ही बीत चुकी है। द्वैतात्मक मन अपनी द्वैतात्मक और अंतर्निहित-स्वभाव-ग्रहण करने वाली यांत्रिकी की दरिद्रता के कारण एक “पृष्ठभूमि” गढ़ लेता है। वह बिना किसी पकड़ के कुछ समझ नहीं सकता, कार्य नहीं कर सकता। “मैं” का वह अनुभव वस्तुतः एक पूर्ण, अद्वैत, अग्रभूमि-अनुभव है।

जब पृष्ठभूमि-रूपी विषय को भ्रम समझ लिया जाता है, तब सभी क्षणभंगुर प्रपंच स्वयं को उपस्थिति के रूप में प्रकट करते हैं। यह मानो स्वाभाविक रूप से सर्वत्र ‘विपश्यना-सदृश’ हो जाता है। PC की हिस-ध्वनि से लेकर चलती MRT ट्रेन के कंपन तक, पैरों के ज़मीन छूने की संवेदना तक — ये सभी अनुभव बिल्कुल क्रिस्टल-सी स्पष्ट होते हैं; “I AM” से किसी भी तरह कम “I AM” नहीं। उपस्थिति पूर्ण रूप से उपस्थित रहती है; किसी चीज़ का निषेध नहीं होता। :-) इसलिए “I AM” विषय-वस्तु-विभाजन मिट जाने पर किसी भी अन्य अनुभव जैसा ही है। उठती हुई किसी ध्वनि से कोई भिन्न नहीं। यह केवल बाद-विचार के रूप में, जब हमारी द्वैतात्मक और अंतर्निहित प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती हैं, तब एक स्थिर पृष्ठभूमि बनती है।

जागरूकता का प्रत्यक्ष सामना करने वाले पहले ‘“मैं”-भाव’ चरण को उस गोले की सतह पर एक बिंदु जैसा समझो, जिसे तुमने “केंद्र” कहा और चिह्नित कर दिया।

फिर बाद में तुम समझते हो कि जब गोले की सतह पर अन्य बिंदुओं को चिह्नित करते हो, तो उनमें भी वही गुण हैं। यही अद्वैत का प्रारम्भिक अनुभव है। जब अनात्मा/नैरात्म्य (No-Self) की अंतर्दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब तुम गोले की सतह पर किसी भी बिंदु की ओर स्वतंत्रतापूर्वक संकेत कर सकते हो — हर बिंदु एक केंद्र है; इसलिए कोई “वह” केंद्र नहीं है। “वह” केंद्र अस्तित्व में ही नहीं: सभी बिंदु केंद्र हैं।

इसके बाद साधना ‘एकाग्रतामुखी’ से ‘सहज-अकृतकता’ की ओर बढ़ती है। यह कहने पर भी, इस प्रारम्भिक अद्वैत अंतर्दृष्टि के बाद “पृष्ठभूमि” कभी-कभी कुछ वर्षों तक अवशिष्ट प्रवृत्तियों के कारण फिर उभरता रहेगा...

86. RE: क्या कोई परम वास्तविकता है? [Skarda 4 of 4]

27 मार्च 2009

और अधिक सटीक कहें तो, तथाकथित “पृष्ठभूमि-चेतना” वही निर्मल घटित होना है। कोई अलग “पृष्ठभूमि” नहीं और अलग “निर्मल घटित होना” नहीं। अद्वैत के प्रारम्भिक चरण में अब भी उस काल्पनिक विभाजन को “ठीक” करने का एक आदतन प्रयास बना रहता है, जो वास्तव में है ही नहीं। यह तब परिपक्व होता है जब हम समझते हैं कि अनात्मा कोई चरण नहीं बल्कि धर्म-मुद्रा है; सुनते समय हमेशा केवल ध्वनियाँ, देखते समय हमेशा केवल रंग, आकृतियाँ और रूप, सोचते समय हमेशा केवल विचार। यह सदैव और पहले से ही ऐसा ही है। :-)

अद्वैत के सहज बोध के बाद अनेक अद्वैतवादी परम सत्ता को कसकर पकड़े रहते हैं। यह ऐसा है जैसे गोले की सतह पर एक बिंदु से चिपक जाना और उसे “एकमात्र केंद्र” कहना। यहाँ तक कि वे अद्वैती भी जिनमें अनात्मा (विषय-वस्तु-विभाजन का अभाव) की स्पष्ट अनुभवजन्य अंतर्दृष्टि होती है, फिर भी अनात्मा-समान अनुभव (विषय के प्रथम रिक्तीकरण) के बाद इन प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं होते। वे फिर भी किसी स्रोत (Source) में लौटते रहते हैं।

जब तक अवशिष्ट संस्कार पर्याप्त रूप से विलीन नहीं हुए, स्रोत (Source) की ओर लौटना स्वाभाविक है; लेकिन उसे ठीक-ठीक उसी रूप में समझना चाहिए जैसा वह है। क्या यह आवश्यक है? और जब हम उसके ठिकाने तक का निर्धारण नहीं कर सकते, तो स्रोत (Source) में कैसे विश्राम कर सकते हैं? वह विश्राम-स्थान कहाँ है? पीछे क्यों लौटें? क्या यह भी मन का एक और भ्रम नहीं? “पृष्ठभूमि” केवल स्मरण में उभरने वाला एक विचार-क्षण है, या स्रोत (Source) की फिर से पुष्टि करने का प्रयास। इसमें ऐसी क्या आवश्यकता है? क्या हम कभी एक विचार-क्षण जितना भी उससे अलग हो सकते हैं? अनुभव को पकड़कर एक “केंद्र” में जमाने की प्रवृत्ति मन की आदतन चाल है। यह केवल कर्मिक प्रवृत्ति है। इसे पहचानो! Adam से मैंने One-Mind और No-Mind का जो भेद कहा था, उसका आशय यही है।

– John Tan, 2009 (शून्यता बतौर दृष्टिरहित दृष्टि (Viewless View) और क्षणभंगुरता को आलिंगन करना (Emptiness as Viewless View and Embracing the Transience)
https://www.awakeningtoreality.com/2009/04/emptiness-as-viewless-view.html)


Soh ने कई वर्ष पहले लिखा था:

I AM के संबंध में: अद्वैत अनुभव या प्रमाणीकरण के क्षण के बावजूद दृष्टि और प्रतिमान अब भी ‘विषय-वस्तु द्वैत’ और ‘अंतर्निहित अस्तित्व’ पर आधारित रहते हैं। लेकिन AtR इसे एक महत्त्वपूर्ण प्राप्ति भी मानता है, और Zen, Dzogchen, Mahamudra, यहाँ तक कि Thai Forest Theravada के अनेक शिक्षकों की तरह इसे एक महत्त्वपूर्ण प्रारम्भिक अंतर्दृष्टि या प्राप्ति के रूप में सिखाता है। AtR मार्गदर्शिका में इस पर कुछ अंश हैं:

“I AM समाधि में I-I के रूप में एक प्रकाशमान विचार है। अनात्मा (Anatta) वह बोध है जिसमें उसी अंतर्दृष्टि को छह प्रवेशों और निर्गमनों तक विस्तारित किया जाता है।”

– John Tan, 2018

– 28 अक्टूबर 2020 की AtR (Awakening to Reality) बैठक का प्रतिलेख https://docs.google.com/document/d/16QGwYIP_EPwDX4ZUMUQRA30lpFx40ICpVr7u9n0klkY/edit


“मन का प्रत्यक्ष साक्षात्कार रूपरहित, ध्वनिरहित, गंधरहित, सुगंध-दुर्गंध-रहित आदि होता है। लेकिन बाद में यह जाना जाता है कि रूप, गंधें, सुगंध-दुर्गंध — ये सब भी मन ही हैं, उपस्थिति ही हैं, प्रकाशमानता ही हैं। अधिक गहरी अंतर्दृष्टि के बिना व्यक्ति बस “मैं हूँ” (I AM) स्तर पर ही रुक जाता है और उसी रूपरहित आदि अवस्था से चिपक जाता है। यही Thusness का चरण 1 है। I-I या I AM को बाद में यह समझा जाता है कि वह निर्मल चेतना का केवल एक पक्ष, एक ‘इन्द्रिय-द्वार’ मात्र है। बाद में यह देखा जाता है कि वह किसी रंग, ध्वनि, संवेदना, गंध, स्पर्श या विचार से न तो अधिक विशेष है और न अधिक परम; क्योंकि ये सभी अपनी जीवंत दीप्ति और प्रकाशमानता को प्रकट करते हैं। I AM का वही स्वाद अब सभी इन्द्रियों तक विस्तृत हो जाता है। अभी तुम्हें ऐसा महसूस नहीं होता, क्योंकि तुमने केवल मन या विचार-द्वार की प्रकाशमानता की ही पुष्टि की है। इसलिए तुम्हारा जोर रूपरहित, गंधरहित आदि पर रहता है। अनात्मा के बाद बात भिन्न हो जाती है: सब कुछ एक ही प्रकाशमान, शून्य स्वाद का होता है।”

– Soh, 2020

John Tan: जब चेतना “I AM” की शुद्ध अनुभूति का अनुभव करती है और होने-बोध के उस अतीन्द्रिय, विचाररहित क्षण से अभिभूत हो जाती है, तो वह उस अनुभव को अपनी सबसे शुद्ध पहचान के रूप में पकड़ लेती है। ऐसा करते हुए वह सूक्ष्म रूप से एक ‘देखने वाला’ रच देती है और यह नहीं देख पाती कि ‘अस्तित्व की शुद्ध अनुभूति’ (Pure Sense of Existence) वास्तव में मनो-क्षेत्र से संबंधित शुद्ध चेतना का केवल एक पक्ष है। यही आगे चलकर वह कर्मिक अवस्था बनता है जो अन्य इन्द्रिय-विषयों से उदित होने वाली शुद्ध चेतना के अनुभव को रोकती है। जब इसे अन्य इन्द्रियों तक विस्तृत करते हैं, तो वहाँ सुनना है पर कोई सुनने वाला नहीं, देखना है पर कोई देखने वाला नहीं — शुद्ध ध्वनि-चेतना (Pure Sound-Consciousness) का अनुभव शुद्ध दृश्य-चेतना (Pure Sight-Consciousness) से बिलकुल भिन्न है। सच कहूँ तो, यदि हम ‘मैं’ को छोड़कर उसकी जगह ‘शून्यता-स्वभाव’ (Emptiness Nature) को रख सकें, तो चेतना अ-स्थानिक के रूप में अनुभव होती है। कोई एक अवस्था दूसरी से अधिक शुद्ध नहीं होती। सब कुछ बस एक-स्वाद है — उपस्थिति (Presence) की बहुविधता।

“बुद्ध-स्वभाव ‘I AM’ नहीं है” (Buddha Nature is NOT "I Am")

24 अप्रैल 2020

John Tan: I AM अवस्था में सबसे महत्वपूर्ण अनुभव क्या है? I AM अवस्था में क्या अवश्य होना चाहिए? वहाँ “AM” भी नहीं है, बस “मैं”... पूर्ण स्थिरता, केवल “मैं”, सही?

Soh Wei Yu: बोध, अस्तित्व की निश्चितता... हाँ, बस स्थिरता और ‘मैं या अस्तित्व’ की संदेहरहित अनुभूति।

John Tan: और यह पूर्ण स्थिरता, यह मात्र “मैं”, क्या है?

Soh Wei Yu: बस “मैं”, बस उपस्थिति स्वयं।

John Tan: यह स्थिरता सब कुछ को अपने भीतर समेट लेती है, बाकी सबको बाहर कर देती है, और सबको “मैं” में ही शामिल कर देती है। उस अनुभव को क्या कहते हो? वह अनुभव अद्वैत है। और उस अनुभव में वास्तव में न कोई बाहरी है, न भीतरी; न कोई पर्यवेक्षक है, न पर्यवेक्षित। केवल “मैं” के रूप में पूर्ण स्थिरता है।

Soh Wei Yu: समझ गया। हाँ, I AM भी अद्वैत है।

John Tan: वही तुम्हारे अद्वैत अनुभव का पहला चरण है। हम कहते हैं कि यह स्थिरता में शुद्ध मनोद्वार-अनुभव है — मनो-क्षेत्र का। लेकिन उस क्षण हमें यह ज्ञात नहीं होता... हम इसे परम वास्तविकता मान लेते हैं।

Soh Wei Yu: हाँ... उस समय मुझे अजीब लगता था जब आपने कहा था कि यह “अवधारणाहीन विचार-द्वार अनुभव” है।

John Tan: हाँ।

2011

John Tan: “I AM” क्या है? क्या यह PCE है?
(Soh: PCE = शुद्ध चेतना-अनुभव [pure consciousness experience])

John Tan: क्या इसमें भावना है? अनुभूति है? विचार है? क्या कोई विभाजन है, या पूर्ण स्थिरता? सुनते समय केवल ध्वनि है — बस यह पूर्ण, प्रत्यक्ष, स्पष्ट ध्वनि! तो “I AM” क्या है?

Soh Wei Yu: वही है। बस वही शुद्ध, अवधारणाहीन मनोद्वार-अनुभव है।

John Tan: क्या वहाँ ‘होने’ का बोध है?

Soh Wei Yu: नहीं, एक अंतिम पहचान बाद-विचार के रूप में गढ़ी जाती है।

John Tan: निस्संदेह। भ्रम पैदा करने वाली चीज़ उस अनुभव के बाद की गलत व्याख्या है। वह अनुभव स्वयं एक शुद्ध चेतना-अनुभव (pure conscious experience) है। उसमें कुछ भी अशुद्ध नहीं। इसी कारण वह शुद्ध अस्तित्व की अनुभूति जैसा लगता है। गलती केवल ‘गलत दृष्टि’ के कारण होती है; इसलिए यह मनो-क्षेत्र में शुद्ध चेतना-अनुभव (pure conscious experience) है — ध्वनि, स्वाद, स्पर्श आदि नहीं। PCE का अर्थ है दृष्टि, ध्वनि, स्वाद आदि जो भी हम अनुभव करें, उसका प्रत्यक्ष और निर्मल अनुभव — ध्वनि में, स्पर्श में, स्वाद में, दृश्य में अनुभव की गुणवत्ता और गहराई। क्या उसने इन्द्रियों में उस अपार प्रकाशमान स्पष्टता को सचमुच अनुभव किया है? यदि हाँ, तो ‘विचार’ का क्या? जब सारी इन्द्रियाँ बंद हों, तब इन्द्रियों के बंद होने पर जैसी शुद्ध अस्तित्व-अनुभूति होती है, उसे देखो। फिर इन्द्रियाँ खुलने पर उसे स्पष्ट समझ के साथ देखो। बिना स्पष्ट समझ के अविवेकपूर्ण तुलना मत करो।

2007

Thusness: “मैं हूँ”-भाव (I AMness) को प्रबोधन का कोई निम्न स्तर मत समझो। अनुभव वही है; फर्क केवल स्पष्टता का है — अनुभव का नहीं, अंतर्दृष्टि का। इसलिए जिसने “मैं हूँ”-भाव (I AMness) और अद्वैत दोनों का अनुभव किया है, उसके अनुभव में अंतर नहीं, केवल अंतर्दृष्टि में अंतर है।

AEN: समझ गया।

Thusness: अद्वैत में हर क्षण उपस्थिति का अनुभव होता है, या हर क्षण के उपस्थिति-अनुभव की अंतर्दृष्टि होती है। क्योंकि उस अनुभव को रोकने वाली चीज़ ‘स्व’ का भ्रम है, और “I AM” उसी भ्रमित दृष्टि का रूप है। अनुभव वही है। क्या तुमने नहीं देखा कि मैं Longchen, Jonls आदि से हमेशा कहता हूँ कि उस अनुभव में कुछ गलत नहीं; मैं केवल इतना कहता हूँ कि वह मनो-क्षेत्र की ओर झुका हुआ है। इसलिए भेद मत करो; समस्या क्या है, यह जानो। मैं हमेशा कहता हूँ कि समस्या उपस्थिति के अनुभव में नहीं, उसकी गलत व्याख्या में है। लेकिन “मैं हूँ”-भाव (I AMness) हमें देखने से रोकता है।

2009

Thusness: वैसे, क्या तुम जानते हो कि Hokai के विवरण और “I AM” का अनुभव मूलतः वही है? मेरा आशय Shingon की उस साधना से है जिसमें शरीर, वाणी और मन एक हो जाते हैं। “अग्रभूमि (foreground)” से क्या अभिप्राय है? यही कि पृष्ठभूमि लुप्त हो जाती है और जो बचता है, वही यह है। इसी तरह “I AM” पृष्ठभूमि के बिना चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव है। इसलिए वह बस “I-I” या “I AM” के रूप में वर्णित होती है।

AEN: मैंने लोगों को चेतना का वर्णन इस तरह करते सुना है कि पृष्ठभूमि-चेतना अग्रभूमि (foreground) बन जाती है... तब केवल चेतना ही स्वयं से परिचित रहती है, और वह अब भी I AM जैसा अनुभव लगता है।

Thusness: इसलिए उसका वर्णन “जागरूकता जो स्वयं को और स्वयं के रूप में जानती है” के रूप में किया जाता है।

AEN: लेकिन आपने यह भी कहा था कि I AM वाले लोग एक पृष्ठभूमि में डूबते हैं? पृष्ठभूमि में डूबना = पृष्ठभूमि का अग्रभूमि (foreground) बन जाना?

Thusness: इसलिए मैंने कहा था कि उसे गलत समझा गया है, और हम उसे परम मान लेते हैं।

AEN: समझ गया, लेकिन Hokai ने जो वर्णित किया वह भी अद्वैत अनुभव ही है, है न?

Thusness: मैं तुम्हें कई बार बता चुका हूँ कि अनुभव सही है, पर समझ गलत है। इसलिए यह अंतर्दृष्टि और प्रज्ञा-दृष्टि के खुलने की बात है। I AM के अनुभव में कुछ भी गलत नहीं। क्या मैंने कभी कहा कि उसमें कुछ गलत है? चरण 4 में भी मैंने क्या कहा? ध्वनि का अनुभव उपस्थिति के रूप में ठीक वैसा ही है जैसा “I AM” का।

AEN: समझ गया।

2010

Thusness: लेकिन उसे गलत ढंग से समझ लेना अलग बात है। क्या तुम साक्षीकरण का निषेध कर सकते हो? क्या तुम अस्तित्व की उस निश्चितता का निषेध कर सकते हो?

AEN: नहीं।

Thusness: तब उसमें कुछ भी गलत नहीं है। तुम अपने स्वयं के अस्तित्व का निषेध कैसे कर सकते हो? अस्तित्व का ही निषेध कैसे कर सकते हो? बिना किसी मध्यस्थ के शुद्ध अस्तित्व-अनुभूति का प्रत्यक्ष अनुभव करने में कोई दोष नहीं। इस प्रत्यक्ष अनुभव के बाद तुम्हें अपनी समझ, अपनी दृष्टि, अपनी अंतर्दृष्टि को परिष्कृत करना चाहिए — न कि अनुभव के बाद सही दृष्टि से हटकर अपनी गलत दृष्टि को और मजबूत करना चाहिए। तुम साक्षी का निषेध नहीं करते; तुम उसके बारे में अपनी अंतर्दृष्टि को परिष्कृत करते हो। अद्वैत का क्या अर्थ है? अवधारणाहीनता का क्या अर्थ है? सहजता क्या है? ‘अवैयक्तिकता’ का पक्ष क्या है? दीप्ति क्या है?

Thusness: तुम कभी किसी अपरिवर्तनीय वस्तु का अनुभव नहीं करते। बाद के चरणों में, जब अद्वैत का अनुभव होता है, तब भी पृष्ठभूमि पर टिकने की यह प्रवृत्ति बनी रहती है... और यही तुम्हारी प्रगति को TATA लेख में वर्णित प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टि तक जाने से रोक देगी। और उस स्तर की प्राप्ति के बाद भी तीव्रता की अलग-अलग डिग्रियाँ होती हैं। TADA केवल अद्वैत नहीं है... वह चरण 5–7 है। यह सब अनात्मा और शून्यता की अंतर्दृष्टि के एकीकरण के बारे में है। क्षणभंगुरता में जीवंतता; रूपों के रूप में जागरूकता की उस “बनावट और ताने-बाने” को महसूस करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। फिर शून्यता आती है। दीप्ति और शून्यता का समावेश।

Thusness: उस साक्षीकरण का निषेध मत करो; दृष्टि को परिष्कृत करो — यह बहुत महत्वपूर्ण है। अब तक तुमने साक्षीकरण के महत्व पर सही ज़ोर दिया है। पहले की तरह नहीं, जब तुम लोगों को यह आभास देते थे कि तुम इस साक्षी-उपस्थिति का निषेध कर रहे हो। तुम केवल व्यक्तिकरण, सत्ताकरण और वस्तुकरण का निषेध करते हो ताकि आगे बढ़कर हमारी शून्य-प्रकृति को साकार कर सको। लेकिन जो मैंने MSN में तुम्हें बताया, उसे हमेशा पोस्ट मत किया करो; नहीं तो कुछ ही समय में मैं किसी तरह का पंथ-नेता बन जाऊँगा।

AEN: समझ गया।

Thusness: अनात्मा कोई साधारण अंतर्दृष्टि नहीं है। जब हम पूर्ण पारदर्शिता के स्तर तक पहुँचते हैं, तब तुम उसके लाभ जानोगे। अवधारणाहीनता, स्पष्टता, दीप्ति, पारदर्शिता, खुलापन, विशालता, विचाररहितता, अ-स्थानिकता... ये सभी वर्णन काफ़ी अर्थहीन हो जाते हैं।

19 अक्टूबर 2008

Thusness: हाँ। वास्तव में अभ्यास इस ‘Jue’ (जागरूकता) का निषेध करना नहीं है। जिस तरह तुम समझा रहे थे, उससे ऐसा लगता था मानो “कोई जागरूकता नहीं” है। लोग कई बार तुम्हारे आशय को गलत समझ लेते हैं; बात यह है कि इस ‘Jue’ को ठीक प्रकार समझा जाए ताकि इसे हर क्षण सहज रूप से जिया जा सके। लेकिन जब कोई साधक सुनता है कि यह “वह” नहीं है, तो वह तुरंत चिंतित हो जाता है, क्योंकि यही उसकी सबसे मूल्यवान अवस्था होती है। जो सारे चरण लिखे गए हैं, वे इसी ‘Jue’ या जागरूकता के बारे में हैं। पर जागरूकता वास्तव में क्या है, यह ठीक से अनुभव नहीं किया गया। और क्योंकि उसका सही अनुभव नहीं हुआ, इसलिए हम कहते हैं कि “जिस जागरूकता को तुम बनाए रखना चाहते हो” वह उस तरह अस्तित्व में नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि जागरूकता है ही नहीं।


28 अक्टूबर 2020

William Lam: यह अवधारणाहीन है।

John Tan: यह अवधारणाहीन है। हाँ। उपस्थिति कोई वैचारिक अनुभव नहीं है; यह प्रत्यक्ष होना चाहिए। और तुम बस अस्तित्व की एक शुद्ध अनुभूति महसूस करते हो। लोग पूछते हैं — जन्म से पहले तुम कौन थे? और तुम उस “मैं” को सीधे-सीधे प्रमाणित करते हो; वही तुम स्वयं हो। इसलिए जब पहली बार तुम उस “मैं” को प्रमाणित करते हो, तो तुम बेहद प्रसन्न हो जाते हो, स्वाभाविक ही है। जब मैं युवा था, उस समय — वाह... मैंने इस “मैं” को प्रमाणित किया... तब तुम्हें लगता है कि तुम प्रबुद्ध हो गए, लेकिन यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। यह पहली बार है जब तुम कुछ ऐसा चखते हो जो बिल्कुल भिन्न है। यह विचारों से पहले है; वहाँ कोई विचार नहीं। तुम्हारा मन पूर्णतः स्थिर है। तुम स्थिरता महसूस करते हो, उपस्थिति महसूस करते हो, और स्वयं को जानते हो। जन्म से पहले भी यह “मैं” है, जन्म के बाद भी यह “मैं” है; 10,000 वर्ष बाद भी यही “मैं”; 10,000 वर्ष पहले भी यही “मैं”। जब यह प्रमाणीकरण हो जाता है, तब तुम्हारा मन केवल उसी में रहता है और तुम्हें अपने सच्चे अस्तित्व पर संदेह नहीं रहता।

Kenneth Bok: उपस्थिति ही यह I AM है?

John Tan: उपस्थिति और I AM एक ही हैं। निश्चय ही दूसरे लोग असहमत हो सकते हैं, पर वास्तव में वे उसी एक बात की ओर संकेत कर रहे हैं — उसी प्रमाणीकरण की ओर। Zen में भी बात अंततः वही है। लेकिन बाद के चरण में मैं इसे केवल मनो-क्षेत्र कहता हूँ। अर्थात् छह प्रवेशों और छह निर्गमनों के संदर्भ में... उस समय तुम हमेशा कहते हो: मैं ध्वनि नहीं हूँ, मैं प्रकटता नहीं हूँ; मैं वही स्व हूँ जो इन सब प्रकटताओं के पीछे है, ठीक? तो ध्वनियाँ, संवेदनाएँ, विचार — ये सब आते-जाते हैं; वे मैं नहीं हैं, सही? यही परम “मैं” है। स्व ही परम “मैं” है। सही?

William Lam: तो क्या I AM चरण अद्वैत है? यह अवधारणाहीन है, लेकिन क्या यह अद्वैत है?

John Tan: यह अवधारणाहीन है। हाँ, यह अद्वैत है। यह अद्वैत क्यों है? क्योंकि उस क्षण कोई द्वैतता नहीं होती। जिस क्षण तुम स्व का अनुभव करते हो, उस क्षण द्वैत नहीं हो सकता, क्योंकि तुम स्वयं को सीधे-सीधे उसी के रूप में प्रमाणित करते हो — होने की इस शुद्ध अनुभूति के रूप में। इसलिए वहाँ पूर्णतः “मैं” ही “मैं” है; और कुछ नहीं। बस “मैं”। बस स्व। मुझे लगता है तुममें से बहुतों ने I AM का अनुभव किया होगा। इसलिए संभवतः तुम सब हिन्दू परम्पराओं के पास जाओगे, उनके साथ भजन गाओगे, उनके साथ ध्यान करोगे, उनके साथ सोओगे — सही? वे युवावस्था के दिन थे। मैं उनके साथ ध्यान करता था, घंटों-घंटों; उनके साथ खाता था, ड्रम बजाता था। क्योंकि वे यही उपदेश देते थे, और तुम्हें लगता था कि यह एक ऐसा समूह है जो उसी भाषा में बोल रहा है। यह कोई साधारण अनुभव नहीं है। जब मैं 17 वर्ष का था और पहली बार यह अनुभव हुआ, तो लगा — वाह, यह क्या है? यह अवधारणाहीन है, यह अद्वैत है। लेकिन उस अनुभव में लौटना बहुत कठिन है — बहुत, बहुत कठिन — जब तक तुम ध्यान में न हो, क्योंकि तुम सापेक्ष प्रकटताओं को अस्वीकार करते हो। केवल अनात्मा के बाद तुम समझते हो कि जब तुम बिना पृष्ठभूमि के ध्वनि सुनते हो, तो उसका स्वाद उपस्थिति के अनुभव जैसा ही है — I AM उपस्थिति जैसा ही। जब तुम अभी इन प्रत्यक्ष, जीवंत प्रकटताओं में हो, वही अनुभव भी I AM का ही स्वाद रखता है। जब तुम अपनी संवेदनाओं को बिना किसी पृष्ठभूमिगत स्व के सीधे महसूस करते हो, तब भी वह अनुभव ठीक I AM जैसा ही है। वही अद्वैत है। तब तुम समझते हो: वास्तव में सब कुछ मन है। उससे पहले एक परम स्व (Self), एक पृष्ठभूमि, और बाकी सारे क्षणभंगुर प्रपंचों का निषेध होता है। उसके बाद वह पृष्ठभूमि चला जाता है, और केवल ये सब प्रकटताएँ रह जाती हैं।

William Lam: तो क्या आप वही प्रकटता हैं? वही ध्वनि?

John Tan: हाँ। वह एक अनुभव है। उसके बाद तुम्हें समझ में आता है कि शुरू से ही जो चीज़ तुम्हें ढँक रही थी, वह ‘क्या’ थी। जो व्यक्ति I AM के अनुभव में है, शुद्ध उपस्थिति (Pure Presence) के अनुभव में है, उसके भीतर हमेशा एक सपना रहता है। वह कहेगा: काश मैं चौबीसों घंटे, सातों दिन, हमेशा उसी अवस्था में रह सकूँ। फिर 20 साल बाद तुम पूछते हो — मुझे हमेशा ध्यान क्यों करना पड़ता है? जिस चीज़ का तुम हमेशा सपना देखते रहे कि एक दिन शुद्ध चेतना के रूप में जी सकोगे, वह तुम्हें कभी नहीं मिलती। केवल अनात्मा के बाद, जब पीछे का वह स्व चला जाता है... तब सामान्य जाग्रत अवस्था में ही सहजता आ जाती है। I AM चरण में तुम जो सोचते हो कि प्राप्त कर लोगे, वह अनात्मा की अंतर्दृष्टि के बाद प्राप्त होता है। लेकिन उसके बाद भी और अंतर्दृष्टियाँ हैं जिनसे तुम्हें गुजरना होगा। जब तुम सापेक्ष को, प्रकटताओं को, सीधे अनुभव करते हो, तब सब कुछ बहुत भौतिक-सा हो जाता है। तब मैंने इस बात की जाँच शुरू की: वास्तव में ‘भौतिक’ क्या है? तुम भौतिकता के चारों ओर बने हुए अवधारणात्मक ढाँचों को खोलते हो। फिर मुझे समझ में आने लगा कि जब भी हम विश्लेषण करते हैं और सोचते हैं, हम पहले से उपलब्ध वैज्ञानिक अवधारणाओं और तर्क का उपयोग कर रहे होते हैं, और वे हमेशा चेतना को बाहर कर देते हैं। तुम्हारी अवधारणाएँ हमेशा बहुत भौतिकवादी होती हैं। हम हमेशा पूरे समीकरण से चेतना को बाहर कर देते हैं।

10 जुलाई 2007

Thusness: X पहले कुछ ऐसा कहा करता था कि हमें ‘yi jue’ (जागरूकता पर भरोसा) करना चाहिए, ‘yi xin’ (विचारों पर भरोसा) नहीं; क्योंकि jue शाश्वत है और विचार अनित्य हैं... कुछ ऐसा। यह सही नहीं है। यह अद्वैत वेदान्त की शिक्षा है।

AEN: समझ गया।

Thusness: अब बौद्ध धर्म में जो बात समझना सबसे कठिन है, वह यह है: अपरिवर्तनीय का अनुभव करना कठिन नहीं है। लेकिन अनित्यता का अनुभव करते हुए भी अजन्मा स्वभाव को जानना — यही प्रज्ञा-ज्ञान है। यह गलतफहमी होगी कि बुद्ध अपरिवर्तनीय अवस्था को नहीं जानते थे। या जब बुद्ध ने अपरिवर्तनीय की बात की, तो उसका अर्थ किसी अपरिवर्तनीय पृष्ठभूमि से था। नहीं तो फिर मैं गलतफहमी और मिथ्या-व्याख्या पर इतना जोर क्यों देता? और यह भी गलतफहमी है कि मैंने अपरिवर्तनीय का अनुभव नहीं किया। तुम्हें जो जानना चाहिए, वह यह है कि अनित्यता में अंतर्दृष्टि विकसित करो और साथ ही अजन्मा को जानो। यही प्रज्ञा-ज्ञान है। स्थायित्व को ‘देख’ कर यह कह देना कि वही अजन्मा है — यह मात्र संवेग है। जब बुद्ध स्थायित्व की बात करते हैं, तो उसका संकेत उस ओर नहीं होता। उस संवेग के पार जाने के लिए तुम्हें लंबे समय तक नितांत अनावृत होकर टिक सकना चाहिए। फिर स्वयं अनित्यता का अनुभव करो — किसी चीज़ पर कोई लेबल लगाए बिना। धर्म-मुद्राएँ तो स्वयं बुद्ध के व्यक्ति-रूप से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। बुद्ध भी यदि गलत समझे जाएँ, तो वे भी संसारी रूप में ग्रहण कर लिए जाते हैं। Longchen ने closinggap, reincarnation पर एक रोचक अंश लिखा था।

AEN: ओह हाँ, मैंने उसे पढ़ा था। वही जिसमें उन्होंने kyo के उत्तर को स्पष्ट किया था?

Thusness: वह उत्तर बहुत महत्त्वपूर्ण है, और वह यह भी सिद्ध करता है कि Longchen ने क्षणभंगुरों और पाँच स्कन्धों को बुद्ध-स्वभाव के रूप में समझने के महत्व को साक्षात् जाना था। अब समय है अजन्मा स्वभाव की ओर जाने का। देखो, किसी को ऐसे चरणों से गुजरना पड़ता है — “I AM” से अद्वैत, फिर है-भाव (Isness), और फिर बुद्ध की सबसे बुनियादी शिक्षा तक... क्या तुम यह देख सकते हो?

AEN: हाँ।

Thusness: जितना अधिक कोई अनुभव करता है, उतना अधिक वह बुद्ध की सबसे बुनियादी शिक्षा में सत्य को देखता है। Longchen ने जो कुछ भी अनुभव किया, वह इसलिए नहीं कि उन्होंने केवल बुद्ध की शिक्षाएँ पढ़ीं; बल्कि इसलिए कि उन्होंने उसे सचमुच अनुभव किया।

AEN: समझ गया।

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